Rajasthan history in hindi | पाषाण काल | top 15 qouestions

पाषाण काल
Rajasthan history in hindi | पाषाण काल | Rajasthan Gk

Rajasthan history

राजस्थान इतिहास(Rajasthan History)

पाषाण काल (25,00,000 ई.पू.- 1,000 ई. पू.) को तीन युगों में बांटा जाता है— पुरा / पूर्व (Paleo), मध्य (Meso) व नव (Neo)। राजस्थान में तीनों युगों के साक्ष्य मिले हैं।
2.1 पुरापाषाण युग (Paleolithic Age)
आखेटक व खाद्य-संग्राहक : राजस्थान में पुरापाषाण युग के अवशेष अजमेर, अलवर, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, जयपुर, जालौर, पाली, टोंक आदि क्षेत्रों की नदियों के किनारे प्राप्त हुए हैं। इन नदियों में चम्बल, बनास व लूनी प्रमुख हैं। पुरापाषाणयुगीन प्राकृतिक गुफाएं व शिलाकुटीर विराटनगर के निकट पाये गये हैं । भरतपुर जिले के दर नामक स्थान से कुछ शिलाकुटीरों में व्याघ्र, बारहसिंघा तथा कुछ मानव आकृतियों के चित्रांकन मिले हैं।

प्रमुख पुरातात्विक स्थल बेइच, बागन व कदमाली नदी घाटी (चित्तौड़), डीडवाना, पुष्कर आदि ।

2.2 मध्यपाषाण युग (Mesolithic Age)

आखेटक व पशुपालक / सूक्ष्मपाषाणोपकरण (Microlith) संस्कृति – राजस्थान में मध्यपाषाण युग के अवशेष अजमेर, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, टोक, पाली, भीलवाड़ा आदि से प्राप्त हुए हैं। बागौर (भीलवाड़ा जिला) पशुपालन का प्राचीनतम साक्ष्य प्रस्तुत करता है जिसका समय लगभग 5,000 ई. पू. है। बागौर से प्राप्त अवशेषों में सूक्ष्मपाषाणोपकरण (Microhith) एवं मानव कंकाल प्रमुख हैं।

प्रमुख पुरातात्विक स्थल बागीर (भीलवाड़ा जिला), उम्मेदनगर (ओसिया), बिलाड़ा (पुर), रेड (जयपुर) आदि।

23 नवपाषाण युग (Neolithic Age).

खाद्य उत्पादक नवपाषाणयुगीन उपकरणों की प्राप्ति पश्चिमी राजस्थान में लूनी नदी घाटी एवं दक्षिणी-पूर्वी राजस्थान में चित्तौड़ जिले में बेइच, वागन व कदमाली नदियों की पाटियों से प्रचुर मात्रा में हुई हैं। बागीर (भीलवाड़ा) एवं तिलवाड़ा (बाड़मेर) से नवपाषाणयुगीन तकनीकी उन्नति पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। इसके अलावे अजमेर, नागीर, सीकर, झुंझुनू, जयपुर, कोटा, टोंक आदि से नवपाषाणयुगीन अवशेष मिले हैं। प्रमुख पुरातात्विक स्थल बागौर (भीलवाड़ा जिले में कोठारी नदी के किनारे स्थित), तिलवाड़ा (बाड़मेर) आदि |

भारत में पुरापाषाण काल

भारत में पुरापाषाण काल को लोगों द्वारा उपयोग किये जाने वाले पत्थर के औजारों की प्रकृति के अनुसार तीन चरणों में विभाजित किया गया है।

पहले चरण को प्रारंभिक या निम्न पुरापाषाण (500,000 ईसा पूर्व से 50,000 ईसा पूर्व), दूसरा मध्य पुरापाषाण (50,000 ईसा पूर्व से 40,000 ईसा पूर्व) और तीसरा उच्च पुरापाषाण (40,000 ईसा पूर्व से 10,000 ईसा पूर्व) के रुप में जाना जाता है।

कुल्हाड़ियों, चॉपर्स, फ्लेक्स का उपयोग इसकी विशेषताएँ हैं और इस काल के प्रमुख उपकरण में फ्लेक्स से बने ब्लेड, पॉइंट्स, बोरर्स और स्क्रेपर्स शामिल हैं।

मध्यपाषाण काल: शिकारी और चरवाहे

 

यह पुरापाषाण काल और नवपाषाण काल के बीच का संक्रमणकालीन चरण है। मध्यपाषाण काल के लोग शिकार करने के साथ मछली पकड़ने और खाद्य संग्रहण पर निर्भर थे, बाद में उन्होंने जानवरों को भी पालतू बनाया।

नवपाषाण काल:खाद्य उत्पादक

 

इस काल के लोग पॉलिशयुक्त पत्थर के औज़ारों और पत्थर की कुल्हाड़ियों का इस्तेमाल करते थे। इस काल का एक महत्त्वपूर्ण स्थल बुर्जहोम है जो श्रीनगर से 16 किमी उत्तर-पश्चिम में स्थित है। नवपाषाण काल के लोग झील के किनारे गड्ढों में रहते थे और संभवतः इनकी अर्थव्यवस्था शिकार और मछली पकड़ने पर आधारित थी। ऐसा भी प्रतीत होता है कि वे कृषि से परिचित थे।

पाषाण काल के लोगों से आधुनिक मानव निम्नलिखित गुण सीख सकता है:

 

प्रकृति का सम्मान करना और हर जीव को समान महत्त्व देना। पर्यावरण केंद्रित दृष्टिकोण विकसित करना।

आने वाली पीढ़ियों के स्वस्थ जीवन और समृद्धि को ध्यान में रखते हुए सतत जीवन शैली को अपनाना।

प्राचीन कला, संस्कृति और अन्य मूर्त विरासत को संरक्षित करना।

निष्कर्ष:

पाषाण काल के मानव की एक प्रमुख सीमा लगभग पूरी तरह से पत्थर से बने औजारों और हथियारों पर निर्भर रहना था, जिस कारण वे पहाड़ी क्षेत्रों से दूर बस नहीं सकते थे। वे केवल पहाड़ियों की ढलानों, शैल आश्रयों और पहाड़ी नदी घाटियों में ही बस सकते थे। इसके अलावा बहुत प्रयास करने पर भी, वे अपने निर्वाह के लिये जितनी आवश्यकता होती थी उससे अधिक उत्पादन नहीं कर सकते थे।

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