Rajasthan History Notes PDF 2023 Download || ताम्र पाषाण काल

3. ताम्र पाषाण काल

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Rajasthan History Notes pdf

ताम्र पाषाण (Chalco-lithic) काल का अर्थ है वह काल जिसमें ताम्र (तांबे) के साथ साथ पाषाण (पत्थर) के उपकरणों का उपयोग हुआ। राजस्थान में ताम्र पाषाणकालीन संस्कृतियों का विस्तार गंगानगर, नागौर, जालौर, बाड़मेर, उदयपुर, भीलवाड़ा, चित्तौड़, सीकर, दौसा आदि जिलों में था। राजस्थान में पायी जाने वाली दो वृहद् समूह की संस्कृतियों के नाम है— कालीबंगा संस्कृति (सरस्वती दृषद्वती संस्कृति) व आहड़ संस्कृति (बनास संस्कृति) ।
3.1 कालीबंगा संस्कृति (सरस्वती- दृषद्वती / घरघर संस्कृति)
परिचय : कालीबंगा का शाब्दिक अर्थ है— काले रंग की चूड़ियाँ यह स्थल हनुमानगढ़ के निकट सरस्वती दृषद्वती (घग्घर चौताग) नदियों के तट पर बसा हुआ था। सबसे पहले इस स्थल की खोज अमलानंद घोष ने 1951 ई. में की। इसके बाद 1961 से 1969 तक उत्खनन कार्य ब्रजवासी (बी. वी.) लाल, बाल कृष्ण (बी. के.) यापर आदि के निर्देशन म हुआ।
पुरातात्विक अवशेष यहाँ से प्राक हड़प्पा एवं हड़प्पा युगीन सभ्यता के अवशेष है वह प्राकू हडप्पा पूर्व युगीन है। इससे प्राकू हड़प्पा युग में कृषि के प्रसार का
1. प्राक- हड़प्पा युगीन यहाँ से जो कूड/हलरेखा (जुते हुए खेत) के अवशेष मिले संकेत मिलता है। यह कालीबंगा क्षेत्र के उत्खनन की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है। मिले हैं।
2. या युगीन कालीबंगा से प्राप्त हड़प्पा सभ्यता के अवशेषों में उल्लेखनीय है।
चूड़ियाँ (शंख, कांच व मिट्टी की बनी), अग्नि हवन कुंड, खाना पकाने का तंदूर, कच्ची ईंटों से निर्मित घर (केवल एक फर्श में अलंकृत ईंटों का प्रयोग), धान्य कोठार, जी के अवशेष, वृषभ की ताम्रमूर्ति, कांसे का दर्पण, खिलौना गाड़ी के पहिए. गोमूत्रिका लिपि (Boustrophendon Script) खुदे बर्तन, एक मुहर पर व्याघ्र का अंकन ( जबकि सिंधु क्षेत्र में अब व्याघ्र नहीं मिलते), मेसोपोटामिया (इराक) की एक बेलनाकार मुहर आदि । कालीबंगा से मेसोपोटामिया (इराक) की मुहर मिलने से यह संकेत मिलता है कि राजस्थान का व्यापार विदेशी बाजारों से था।
पतनः सरस्वती-दृषद्वती (घरघर) के दोआब में पल्लवित कालीबंगा संस्कृति का पतन धीरे-धीरे इन नदियों के पानी सूखने से हुई। कालीबंगा के पतन का सर्वप्रमुख कारण-जलवायु परिवर्तन (शुष्कता में बढ़ोत्तरी) — अमलानंद घोष; नदियों के मार्ग में परिवर्तन-डेल्स |
3.2 आहड़ संस्कृति (बनास संस्कृति)
परिचय: आहड़ उदयपुर के निकट बनास नदी की घाटी में स्थित था। आहड़ को ताम्रवती/ ताम्बवती के नाम से भी जाना जाता था क्योंकि इसके आस-पास प्रचुर मात्रा में ताम्र / तांबा उपलब्ध था। आहड़ के लिए धूलकोट (धूल का ढेर), आघाटपुर, आघट दुर्ग आदि नाम भी मिलते हैं। इस स्थल का उत्खनन ए.के. व्यास, एच.डी. सांकलिया आदि के निर्देशन में हुआ। आहड़ संस्कृति का काल 2100 ई.पू. 1500 ई.पू. माना जाता है।
पुरातात्विक अवशेष : आहड़ संस्कृति के केंद्रों आहड़, गिलूद गिलँड (सर्वप्रमुख केंद्र), बागौर, पलाडिया आदि से हड़प्पा उत्तर संस्कृति के अवशेष मिले हैं। इन स्थलों से प्राप्त अवशेषों में उल्लेखनीय हैं— ताँबे की कुल्हाड़ियाँ, ताँबे के फलक, ताँबा पिघलाने के काम आनेवाला चूल्हा लोहे के औजार, रिंगवेल, बांस के टुकड़े, हड्डियों, पत्थर से बनी वस्तुएँ काले व लाल मृदभाण्ड, काँच तथा सीप की चूड़ियाँ, यूनानी मुद्राएं (एक मुद्रा पर एक तरफ त्रिशूल व दूसरी तरफ यूनानी देवता अपोलो का अंकन) आदि । यूनानी मुद्राओं की प्राप्ति से इस संस्कृति के वैदेशिक संपर्क का संकेत मिलता है। आहड़ के उत्खनन में मिले स्तरीकरण से प्रतीत होता है कि यहाँ आठ बार वस्ती बसी और उजड़ी। पतन: आहड़ संस्कृति का पतन भूकम्प, बाढ़ या बाह्य आक्रमण के कारण हुआ ।
महत्त्वपूर्ण स्थल
1. प्राकू हडप्पाई स्थल (Pre-Harappan Sites): सोयी ( बीकानेर क्षेत्र), कालीबंगा 
2. हड़प्पाई स्थल (Harappan Sites ): कालीबंगा, पीलीबंगा, गणेश्वर (सीकर जिला में कांतली नदी के किनारे) – यहाँ से तांबे के उपकरण प्राप्त हुए हैं, जिसका मुख्य कारण खेतड़ी ताम्र भण्डार का इस क्षेत्र के निकट होना था, बालाथल (वल्लभनगर तहसील, उदयपुर जिला), शीशयल, बाड़ा, हनुमानगढ़ (रंगमहल, बड़ोपोल, मुंडा, डोवरी आदि स्थल; 1952-54 में स्वीडिश दल द्वारा उत्खनन कार्य), मिथल 1
3. हट्योत्तर स्थल (Post-Harappan Site): आड (ताभ्यवती).
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