Rajasthan Gk | सामान्य परिचय | Rajasthan history notes pdf

इतिहास

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सामान्य परिचय 

राजस्थान का इतिहास प्रागैतिहासिक काल से शुरू होता है। 3000 ई. पू. से 1000 ई. पू. के बीच यहाँ की संस्कृति सिंधु सभ्यता जैसी थी 7वीं सदी से यहाँ चौहान राजपूतों का प्रभुत्व बढ़ने लगा और 12वीं सदी तक उन्होंने एक साम्राज्य स्थापित कर लिया था। चौहानों के बाद इस योद्धा जाति का नेतृत्व मेवाड़ के गुहिलोतों ने संभाला। मेवाड़ के •अलावा जो अन्य राजपूत राज्य ऐतिहासिक दृष्टि से प्रमुख रहे, वे हैं— मारवाड़, जयपुर, बूंदी, कोटा, भरतपुर और अलवर। अन्य सभी राजपूत राज्य इन्हीं राज्यों से बने ।

यद्यपि इनमें से अधिकांश ने 12वीं सदी के अंतिम चरण में मुसलमान आक्रमणकारियों का वीरतापूर्वक सामना किया तथापि प्रायः सम्पूर्ण राजपूताने के राजवंशों को दिल्ली सल्तनत की सर्वोपरि सत्ता स्वीकार करनी पड़ी। फिर भी मुसलमानों की यह प्रभुसत्ता राजपूत शासकों को सदैव खटकती रही और जब कभी दिल्ली सल्तनत में दुर्बलता के लक्षण दिखलाई पड़ते, वे अधीनता से मुक्त होने का प्रयास करते ।

1520 ई. में बाबर के नेतृत्व में मुगलों के आक्रमण के समय राजपूताना दिल्ली के सुल्तानों के प्रभाव से मुक्त हो चला था और मेवाड़ के राणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) ने बाबर के दिल्ली पर अधिकार का विरोध किया। 1527 ई. में खानवा के युद्ध में राणा सांगा की पराजय हुई और मुगलों ने दिल्ली के सुल्तानों का राजपूताने पर नाममात्र को बचा प्रभुत्व फिर से कायम कर लिया। किन्तु राजपूतों का विरोध शांत न हुआ। अकबर की राजनीतिक सूझ-बूझ और दूरदर्शिता का प्रभाव इन पर अवश्य पड़ा और मेवाड़ के अतिरिक्त अन्य सभी राजपूत शासक मुगलों के समर्थक और भक्त बन गये। अंत में जहाँगीर के शासनकाल में मेवाड़ ने भी मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली। औरंगजेब के सिंहासनारूढ़ होने तक राजपूताने के शासक मुगलों के स्वामिभक्त बने रहे। परन्तु औरंगजेब की धार्मिक असहिष्णुता की नीति के कारण दोनों पक्षों में युद्ध हुआ। बाद में एक समझौते के फलस्वरूप राजपूताने में शांति स्थापित हुई ।

प्रतापी मुगलों के पतन से भी राजपूताने के राजपूत शासकों को कोई लाभ नहीं हुआ, क्योंकि 1756 ई. के लगभग राजपूताने में मराठों का शक्ति विस्तार आरंभ हो गया। 18वीं सदी के अंतिम दशकों में भारत की अव्यवस्थित राजनीतिक दशा में उलझने तथा मराठों व पिण्डारियों की लूटमार से त्रस्त होने के कारण राजपूताने के शासकों का मनोबल गिर गया और उनकी देशभक्ति, वीरता तथा आत्म बलिदान की भावनाएं कुंठित हो गई।

यही कारण है कि भारत में अंग्रेजी राज्य की स्थापना के विरुद्ध किसी भी महत्त्वपूर्ण राजपूत राज्य अथवा शासक ने कोई युद्ध नहीं किया। इनके विपरीत राजपूत राज्यों ने 1818 ई. में अधीनस्थ गठबंधन की ब्रिटिश संधि स्वीकार कर ली जिसमें राजाओं के हितों की रक्षा की व्यवस्था थी, लेकिन इस संधि से आम जनता स्वाभाविक रूप से असंतुष्ट थी। 1857 के विद्रोह के बाद लोग स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए महात्मा गाँधी के नेतृत्व में एकजुट हुए। 1935 ई. के भारत सरकार अधिनियम के अनुसार अंग्रेजी शासन वाले भारत में प्रांतीय स्वायत्तता लागू होने के बाद राजस्थान में नागरिक स्वतंत्रता तथा राजनीतिक अधिकारों के लिए आंदोलन तेज हो गया।

1947 में भारत स्वतंत्र हो गया । स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरान्त 1948 में इस क्षेत्र की इन बिखरी हुई रियासतों को एक करने की प्रक्रिया शुरू हुई, जो 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम लागू होने तक जारी रही। सबसे पहले 1948 में ‘मत्स्य संघ’ बना, जिसमें कुछ ही रियासतें शामिल हुईं। धीरे-धीरे बाकी रियासतें भी इसमें मिलती गईं। 1949 तक बीकानेर, जयपुर, जोधपुर व जैसलमेर जैसी मुख्य रियासतें भी इसमें शामिल हो चुकी थीं और इसे ‘संयुक्त वृहत् राजस्थान राज्य’ का नाम दिया गया । 1 नवम्बर, 1956 को अजमेर, आबू रोड तालुका व सुनेल टप्पा के भी शामिल हो जाने के बाद वर्तमान राजस्थान राज्य विधिवत् रूप से अस्तित्व में आया।

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