bhil vidroh || भील विद्रोह (1818-1880) || कब , क्यों ,कहा और किसलिए हुआ

भील विद्रोह (1818-1880) bhil vidroh

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ये सभी एगजाम लिए महत्वपूर्ण है bhil vidroh || भील विद्रोह (1818-1880) || कब , क्यों ,कहा और किसलिए हुआ इन सभी का उतर निचे दिए गए पेरेग्राफ में है |   Ras ,Ias 

  • भील मूलतः एक शान्तिप्रिय जनजाति रही है। ये अंग्रेजों के आगमन तक स्वतंत्र जीवन व्यतीत कर रहे थे तथा 1818 ई. के पश्चात उनके ऊपर स्थापित अर्धसामती व अर्ध औपनिवेशिक नियंत्रण में उन्हें विद्रोह के लिए बाध्य किया।

 

  • 1818 ई में उदयपुर राज्य के भीलों ने अनेक कारणों से विद्रोह किया। एक तो नीलों पर कर थोपने के अंग्रेजी प्रयासो ने भीलों में असंतोष को जन्म दिया।
  • दूसरा, अंग्रेजों की भील दमन नीति ने मीलों के मन में अंग्रेजों के विरुद्ध अनेक मनोवैज्ञानिक संदेह उत्पन्न कर दिए थे।
  • तीसरा, ईस्ट इंडिया कंपनी के सहायक सन्धि के तुरन्त पश्चात् उदयपुर राज्य का आन्तरिक प्रशासन जेम्स टॉड ने अपने हाथ में ले लिया था तथा उसने भीलों पर राज्य का प्रभुत्व स्थापित करने के लिए भीलों को अपने नियंत्रण में लाने का प्रयास किया।
  • चौथा, 1818 की सन्धि के पश्चात् अधिकांश देशी सेनाओं को भंग कर दिया गया था। भील राज्य एवं जागीरदारों की सेना में नियमित अथवा अनियमित रूप से नियुक्त रहते थे तथा इन सेनाओं के नग होने से बेरोजगारी के चलते उनमें असंतोष उत्पन्न होना स्वाभाविक ही था
  • पाचवा, भील अपनी पाल के समीप ही गांवों से रखवाली (चौकीदारी कर) नामक कर तथा अपने क्षेत्रों से गुजरने वाले माल व यात्रियों से बोलाई (सुरक्षा) नामक कर वसूल करते थे। जेम्स टॉड ने राज्य की आय व राजस्व में वृद्धि के प्रयासों के अन्तर्गत तथा मीलों पर कठोर नियंत्रण स्थापित करने के ध्येय से भीलों से उनके ये अधिकार छीन लिए थे
  • यह भील विद्रोह का तात्कालिक कारण बना। भीलों ने अपने इन परम्परागत अधिकारों को छोड़ने से इन्कार करते हुए अंग्रेजों व उदयपुर राज्य के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

 

  • 1818 ई. के अन्त तक उदयपुर राज्य के भीलों ने यह चेतावनी देते हुए अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी कि यदि सरकार उनके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप करेगी, तो वे विद्रोह के लिए बाध्य होंगे।
  • भीलों ने अपने क्षेत्रों की नाकेबन्दी करते हुए राज्य के विरुद्ध बगावत कर दी। लम्बे समय तक राज्य के अधिकारी नील क्षेत्रों में नहीं घुस सके।
  • 1820 ई. के आरम्भ में अंग्रेजी सेना का एक अभियान दल विद्रोही भीलों के दमन हेतु भेजा गया, किन्तु इसे सफलता नहीं मिली। अंग्रेजी सेना की इस असफलता ने भील विद्रोह को और अधिक तीव्र कर दिया था।
  • आगे चलकर जनवरी, 1823 ई. में ब्रिटिश व रियासत की संयुक्त सेनाओं ने दिसम्बर 1823 ई. तक  bhil vidroh  को दबाने में सफलता प्राप्त की। bhil vidroh

 

  • उदयपुर राज्य के bhil vidroh  से प्रभावित होकर डूंगरपुर व बासवाडा राज्यों के भीलों ने भी अल्प अशान्ति उत्पन्न की तथा
  • 1925 में आदिवासी विद्रोहों की बिखरी हुई घटनाएँ घटी। डूगरपुर राज्य में स्थिति अधिक गम्भीर थी
  • इसलिए भीलों के दमन हेतु अंग्रेजी सेना भेजी गई, किन्तु वास्तविक संघर्ष 1 आरम्भ होने के पूर्व ही भील मुखियाओं ने गई, 1825 में समझौता कर लिया इसी प्रकार का समझौता 1 दूगरपुर राज्य की सिमूर बार देवल एवं नन्दू पालो के गीलों ने भी किया। उपर्युक्त समझौते के प्रावधान एकपक्षीय थे,
  • किन्तु इनके माध्यम से अंग्रेज लम्बे समय तक दूगरपुर राज्य में शांति बनाए रखने मैं सफल रहे। bhil vidroh

 

  • उदयपुर राज्य के भीलों ने कभी भी इस प्रकार की शर्तें स्वीकार नहीं की तथा अंग्रेजों व उदयपुर राज्य के समक्ष समर्पण नहीं किया।
  • जनवरी, 1826 ई. में गिरासिया भील मुखिया दौलत सिंह एवं गोविन्दराम ने अंग्रेजों व उदयपुर राज्य के खिलाफ विद्रोह कर दिया था।
  • 1826 ई. में लम्बी बातचीत के उपरान्त दौलत सिंह के आत्मसमर्पण के पश्चात् ही यह विद्रोह समाप्त हुआ।
  • अंग्रेजों व उदयपुर राज्य ने 1838 ई. तक भीलों के प्रति उदार नीति अपनाई क्योंकि दमनात्मका सैनिक आक्रमणों के वाछिस परिणाम प्राप्त नहीं हुए थे यूं छुट-पुट भील उपद्रव की घटनाएं जारी रही, किन्तु कुल मिलाकर 1838 तक उदयपुर राज्य में शान्ति रही।
  • 1836 में बासवाड़ा राज्य में भील उपद्रव हुए जिन्हें अंग्रेजी सेना की सहायता से बांसवाड़ा के महारावल ने तुरन्त नियंत्रित कर दिया था।

 

  • अंग्रेजों ने बल प्रयोग के उपाय नहीं छोड़े, बल्कि मेरवाड़ा बटालियन की पद्धति पर भीलों के विरुद्ध लम्बी सैनिक योजना तैयार की, जिसके अन्तर्गत भीलों पर नियंत्रण स्थापित करने के उद्देश्य से भीलों की सेना के गठन का निर्णय किया।
  • अप्रैल, 1841 में गवर्नर जनरल ने अपनी सलाहकार परिषद की सलाह पर मेवाड़ भील कोर के गठन को स्वीकृति प्रदान कर दी।
  • मेवाड़ भील कोर का मुख्यालय उदयपुर राज्य में खैरवाड़ा रखा गया। मेवाड़ के भील क्षेत्रों में खैरवाड़ा एवं कोटड़ा में दो छावनियां स्थापित की गई।

 

  • अंग्रेजों के सैनिक उपाय कुछ समय तक ही मीलों को शान्त रख सके थे। 1844 में बांसवाड़ा राज्य में छुटपुट bhil vidroh हुए। इसी समय माही काठा एजेन्सी के अन्तर्गत पोसीना (गुजरात) एवं सिरोही राज्य के भील व गिरासिया विद्रोही हो गए थे।
  • बासवाडा राज्य केbhil vidroh को गुजरात में 1846 के कुंवार जिवे वसावों के नेतृत्व में गुजरात के bhil vidroh से बढ़ावा मिला।
  • बासवाड़ा राज्य ने अपने वकील कोठारी केसरीसिंह को सहायता हेतु वेस्टन मालवा ब्रिटिश एजेन्ट के पास भेजा तथा अंग्रेजी सेना की सहायता से 1850 ई. के अन्त तक bhil vidroh को कुचल दिया गया था। bhil vidroh

 

  • 1850 ई. से 1855 ई. के मध्य कोई बड़े bhil vidroh  की घटना नहीं घटी, किन्तु दिसम्बर 1855- में उदयपुर राज्य के कालीबास के भील विद्रोही हो गए थे।
  • महाराणा ने मेहता सवाई सिंह को एक सेना लेकर 1 नवम्बर, 1956 को भीलों के दमन हेतु भेजा सेनाओं ने गांवों में आग लगा दी तथा भारी संख्या में भीलों को मौत के घाट उतार दिया गया। 1880 ई. तक निरन्तर छुटपुट bhil vidrohकी घटनाएँ घटती रही।
  • 1857 ई. की क्रांति के दौरान भी bhil vidroh की सम्भावना थी, किन्तु मील इस राष्ट्रीय क्रान्तिः से अनभिज्ञ थे तथा राजकीय पलटनों ने अंग्रेजों के प्रति विद्रोह नहीं किया। bhil vidroh

 

  • वर्ष 1861 में उदयपुर के समीप खैरवाड़ा क्षेत्र में भील उपद्रवों की घटनाएँ सामने आई। 1863 ई. में कोटडा के भील हिंसक गतिविधियों में संलग्न हो गए, जिसकी जिम्मेदारी मेवाड़ भील कोर के कमान्डिंग अधिकारी ने उदयपुर राज्य पर सौंपी, क्योंकि राज्य के प्रशासनिक अधिकारी भीलों के साथ उचित व्यवहार नहीं कर रहे थे।
  • इन आधारों पर हाकिम को स्थानान्तरित कर दिया तथा सैनिक कार्रवाई व शान्तिपूर्वक समझाकर भील उत्पात को शान्त कर दिया गया था। तत्पश्चात् 1867 ई. में खैरवाड़ा व दूगरपुर के मध्य देवलपाल के भीलों ने उत्पात आरम्भ कर दिया, जिसे मेवाड़ भील कोर ने कुचल दिया था। 1872-75 के दौरान बांसवाड़ा में bhil vidroh की अनेक घटनाएँ घटी बांसवाड़ा राज्य में चिलकारी व शेरगढ़ गाँवों के भील छापामार गतिविधियों द्वारा अशान्त रहे। 1873 – 74 के दौरान इन गांवों के भीलों ने खुला विद्रोह कर दिया था
  • उनकी गतिविधियाँ मध्य भारत के शैलाना व झाबुआ राज्यों तक फैल गई थी। 1881-1882 में उदयपुर राज्य के भील अंग्रेजों व राज्य के विरुद्ध उठ खड़े हुए थे। यह 19वीं सदी का सबसे भयानक भील विद्रोह सिद्ध हुआ। असल में यह लम्बे समय से एकत्रित भील आक्रोश का विस्फोट था। bhil vidroh

 

  • 26 मार्च 1881 की रात में राज्य की सेनाएँ मामा अमानसिंह (राज्य का प्रतिनिधि) एवं लोनारमन (अंग्रेज प्रतिनिधि) के नेतृत्व में बारापाल पहुँची। इसके साथ महाराणा का निजी सचिव श्यामलदारा भी था 27 मार्च को सेना ने बारापाल में सैकड़ों भील झोपड़ियों को जलाकर राख कर दिया 28 मार्च को पूरे दिन सैनिक अभियान जारी रहा था तथा बारापाल के आस-पास भीलों के झोपड़ों को जलाया जाता रहा। फौज की इन कार्रवाइयों से बचने के लिए अधिकांश भीलों ने परिवार सहित स्वयं अपने घरों को उजाड़कर सघन जंगलों व पहाड़ियों की ऊँची चोटियों पर पहुंचकर सुरक्षात्मक स्थिति प्राप्त कर ली थी। bhil vidroh

 

  • अपनी स्थिति सुदृढ कर भीलों ने मार्ग में बाधा उत्पन्न कर राज्य की सेनाओं को आगे बढ़ने रोक दिया। निराश सेना व सेनापतियों ने सुरक्षात्मक स्थिति लेकर रिखवदेव में ढेरे डाल दिए थे। यहाँ लगभग 8000 भीलों ने इन्हें घेर लिया। इस विद्रोह के प्रमुख नेता बीलखपाल का गामेती नीमा पीपली का खेमा एवं समातरी का जोयता थे सैनिक अधिकारियों ने भीलों के साथ शान्ति समझोते के प्रयास किए, किन्तु कोई सफलता नहीं मिली। महाराणा के निजी सचिव श्यामलदास ने रिखवदेव मन्दिर के पुजारी खेमराज भंडारी के माध्यम से भील नेताओं से वार्ता आरम्भ की अन्त में 25 अप्रैल, 1881 को भीलों के साथ एक समझौता हो गया। राज्य के अधिकारी आधा बराड कर छोड़ने, भविष्य में भीलों को जनगणना कार्यों से कष्ट न पहुंचाने एवं विद्रोही भीलों को माफी देने पर सहमत हो गए। भीलो ने राज्य के नियमों के पालन करने का वचन देते हुए कानून-विरोधी गतिविधियों में संलग्न न होने की स्वीकृति दी। उपर्युक्त समझौते ने एक भयंकर bhil vidroh को शान्त अवश्य कर दिया था, किन्तु पूर्ण शान्ति स्थापित नही हो पाई थी।

 

  • यद्यपि मेवाड़ की भील समस्या को 19वीं सदी के अन्त तक पर्याप्त सीमा तक सुलझा लिया गया था, किन्तु डूंगरपुर व बासवाड़ा के भीलों पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया था अतः 20वीं सदी के प्रारंम्भिक वर्षों में डूंगरपुर व बासवाड़ा राज्यों में गोविन्द गिरि के नेतृत्व में शक्तिशाली भील आन्दोलन आरम्भ हुआ। गोविन्द गिरि ने भीलों के उत्थान हेतु समाज एवं धर्म सुधार आन्दोलन आरम्भ किया था जो आगे चलकर राजनीतिक आर्थिक विद्रोह में परिवर्तित हो गया था। गोविन्द गिरि डूगरपुर में बेडसा नामक गांव के निवासी एवं जाति से बंजारा थे। वे स्वयं छोटे किसान थे। उनकी निर्धन आर्थिक दशा एवं उनके पुत्रों व पत्नी की मृत्यु ने उन्हें अध्यात्म की ओर प्रेरित किया तथा वे सन्यासी बन गए। वे कोटा, बूँदी अखाड़े के साधु राजगिरि के शिष्य बन गए। उन्होंने धूनी स्थापित कर एवं निशान (ध्वज) लगाकर आस-पास के क्षेत्र के भीलों को आध्यात्मिक शिक्षा देना आरम्भ किया। bhil vidroh

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  • गोविन्द गिरि के विचारों ने भीलों को जागृत किया एवं उन्हें अपनी दशाओं व अधिकारों के प्रति जागरूक बनाया। इन विचारों ने उन्हें यह सोचने के लिए भी बाध्य कर दिया था कि उनके वर्तमान शासकों ने उन्हें पराधीन कर रखा है, जबकि वे स्वयं इस भूमि के स्वामी थे एवं इन्हें इस पर पुन शासन करना चाहिए। इस प्रकार यह समाज एवं धर्म सुधार आन्दोलन आर्थिक एवं राजनीतिक आन्दोलन में बदलता जा रहा था। bhil vidroh
  • गोविन्द गिरि की उपर्युक्त शिक्षाओं व कल्याणकारी गतिविधियों के कारण उनका भगत प भीलों में अत्यधिक लोकप्रिय हो रहा था। गोविन्द गिरि के बढ़ते हुए प्रभाव से राजा, उनके अधिकारी एवं जागीरदार चिंतित होने लगे थे कि उसका बढ़ता हुआ प्रभाव कहीं उनकी सत्ता को पलट न दे। अतः वे इन उपदेशको अथवा प्रचारकों को अपने राज्य अथवा जागीर की सीमाओं से बाहर निकल जाने पर बाध्य करने लगे, जिससे वर्गीय कटुता बढ़ने लगी तथा समाज एवं धर्म सुधार आन्दोलन राजनीतिक स्वरूप प्राप्त करने लगा था। सन् 1908 में गोविन्द गिरि ने राजपूताना छोड़कर 1910 तक एक कृषक के रूप में गुजरात के सूथ एवं ईडर राज्य के भीलों में कार्य किया। उन्होंने इन राज्यों के भीलों को जायत कर उनका शक्तिशाली जन आन्दोलन तैयार किया था। ईडर राज्य के अन्तर्गत पाल-पट्टा में मील आन्दोलन से ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई कि वहाँ के जागीरदार ने भीलों के साथ 24 फरवरी, 1910 को एक समझौता किया। इस समझौते के अन्तर्गत कुल 21 शर्तें थी जो भीलों के अधिकारों से सम्बंध रखती थी। इस समझौते ने राजस्थान व गुजरात के भीलों को सामन्ती शोषण के विरुद्ध लड़ने का उत्साह दिया। यह समझोता गोविन्द गिरि के आन्दोलन की सफलता कहा जा सकता है। सन् 1911 के आरम्भ मे वह डूंगरपुर स्थित अपने मूल स्थान बेडसा वास आए। वहां उसने पूनी स्थापित कर मीलों को आधुनिक पद्धति पर उपदेश देना आरम्भ किया। सन् 1911 में उन्होंने अपने पंथ को नए रूप में संगठित किया तथा धार्मिक शिक्षाओं के साथ-साथ भीलों को सामन्ती व औपनिवेशिक शोषण से मुक्ति की युक्ति भी समझाने लगे। उन्होंने प्रत्येक भील गांव में अपनी धूनी स्थापित की तथा इनकी रक्षा हेतु कोतवाल नियुक्त किए गए थे। गोविन्द गिरि द्वारा नियुक्त कोतवाल केवल धार्मिक मुखिया ही नहीं थे, बल्कि अपने क्षेत्र के सभी मामलों के प्रभारी थे वे भीलों के मध्य विवादों का निपटारा भी करते थे। इस प्रकार अन्य अर्थो में गोविन्द गिरि की समानान्तर सरकार चलने लगी, किन्तु दूसरी ओर राजा व जागीरदारों द्वारा उनके शिष्यों का उत्पीडन भी जारी रहा। bhil vidroh
  • बेडसा गोविन्द गिरि की गतिविधियों का केन्द्र बन गया था इंटरवियूगरपुर राज्यों तथा पंच महल खेडा जिले के नीला आने लगे। इस आन्दोलनका प्रभाव सम्पूर्ण दी राजस्थान के राज्यों व बम्बई सरकार के अन्तर्गत गुजरात के नील क्षेत्रों में फैल गया था। उनके बढ़ते हुए प्रभाव से भयभीत होकर अप्रैल 1913 में डूंगरपुर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था उनका सी सामान जब्त कर लिया था उन्हें उनके धार्मिक पंथ को छोड़ने के लिए धमकाया। सामन्ती एवं आपेनिवेशिक सत्ता द्वारा उत्पीड़क व्यवहार ने गोविन्द गिरि एवं उनके शिष्यों को सामन्ती च औपनिवेशिक दासता से मुक्ति प्राप्त करने हेतु गील राज की स्थापना की योजना बनाने की ओर प्रेरित किया। bhil vidroh

 

  • गोविन्द गिरि अक्टूबर, 1913 में मानगढ़ पहाड़ी पर पहुंचे तथा भीलों को पहाड़ी पर एकत्रित होने के लिए सन्देशवाहक भेजे गए धीरे-धीरे भारी संख्या में भील पहाड़ी पर आने लगे तथा साथ में राशन पानी व हथियार भी ला रहे थे। इन गतिविधियों ने सूथ, बांसवाडा, डूंगरपुर एवं ईसर राज्यों को चौकन्ना कर दिया था। इन सभी राज्यों ने अपने सम्बन्धित अंग्रेज अधिकारियों से मानगढ़ पर भीलों के जमावडे व पालों में युद्ध के लिए तैयारी कर रहे भीलों को कुचलने की प्रार्थना की। 6 से 10 नवम्बर 1913 में मेवाड़ भील कोर की दो कम्पनियां 104 वेलेजली रायफल्स की एक कम्पनी व सातवी राजपूत रेजीमेन्ट की एक कम्पनी मानगढ़ पर भीलों के जमावड़े को कुचलने के लिए पहुंची। विफल वार्ताओं के बाद 17 नवम्बर, 1913 को अंग्रेजी फौजों ने मानगर की पहाड़ी पर आक्रमण कर दिया। मानगढ़ की पहाड़ी के सामने दूसरी पहाड़ी पर अंग्रेजी फौजों ने तोप मशीन गर्ने तैनात कर रखी श्री एवं यहीं से गोला बारूद दागे जाने लगे। लगभग एक घन्टे तक मानगढ़ पर भीलों ने सेना का सफल मुकाबला किया किन्तु आधुनिक युद्ध सामग्री के समक्ष अधिक समय तक टिक नहीं सके। मान की पहाड़ी के नीचे तैनात अंग्रेजी फौज पहाड़ी को घेरते हुए ऊपर पहुंची तथा भीलों को अंधाधुंध गोलियों से भूनना आरम्भ कर दिया। भीलों में भी भगदड मच गई। कुछ ही समय में पहाड़ी पर भीलों ने आत्मसमर्पण कर दिया. उसके उपरान्त भी भीलों का कत्लेआम जारी रहा। अंग्रेजी दस्तावेजों के अनुसार कुल 100 भील गारे गए थे तथा 900 भीलों को बन्दी बना लिया गया। इनके साथ ही गोविन्द गिरि व पुजीया को भी बन्दी बना लिया गया था। bhil vidroh
  • भील आन्दोलन कुचल दिया गया था। किन्तु भील अपने गुरु की गिरफ्तारी को लेकर आन्दोलित थे। भीलों में गोविन्द गिरि भारी लोकप्रिय थे क्योंकि उन्होंने उन्हें अनेक बुराइयों से मुक्ति दिलाई थी। अतः गोविन्द गिरि की लोकप्रियता के कारण उनकी आजीवन कारावास की सजा को दस वर्ष की सजा में बदल दिया गया था तथा सात वर्ष के पश्चात इस शर्त पर रिहा कर दिया गया था कि ये सूथ, डुगरपुर, बांसवाडा, कुशलगढ़ एवं ईडर राज्यों में प्रवेश नहीं करेंगे। ये सरकारी निगरानी में अहमदाबाद सम्भाग के अन्तर्गत पंचमहल जिले के झालोद नामक गांव में रहने लगे। इसी स्थान पर सभी क्षेत्रों के भगत भील (उनके प्रवचन सुनने वही पहुँचने लगे। bhil vidroh

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