Bhil Art And Culture || 1.भील (BHIL) || राजस्थान की प्रमुख जनजातियों || Ras /Ias Mains

राजस्थान की प्रमुख जनजातियों का वर्णन

राजस्थान में पाई जाने वाली प्रमुख जनजातियों का नृजाति वर्णन निम्नलिखित है-Bhil Art And Culture

भील (BHIL)

राजस्थान की सबसे प्राचीन जनजाति भील संख्या की दृष्टि से मीणा के बाद यहां की दूसरी बड़ी जनजाति है। ऊँची पहाड़ियों पर रहने वाले भीलों को ‘पालवी’ तथा मैदानों में रहने वाली भीलों को ‘वागड़ी’ कहते हैं। विशेषकर सिरोही, उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, राजसमंद एवं चित्तौड़गढ़ जिलों में भील जनजाति का जमाव पाया जाता है। शाब्दिक अर्थ से ‘भील’ का अर्थ ‘तीर चलाने वाले व्यक्ति’ (Archer or Bowman) से लिया गया है। यह द्रविड़ भाषा का शब्द है जिसकी उत्पत्ति बिल (Bil) या विल (Vil) अर्थात् तीर से हुई है।Bhil Art And Culture

द्रविड़ भाषा के शब्द ‘पिल्लू’ अथवा ‘बिल्लू’ का अर्थ ‘धनुष या तीरंदाज’ होता है। जो भील जनजाति की पहचान बताने वाला हथियार है, ऐसा कुछ विद्वान मानते हैं। भील जनजाति की पहचान हरिया कामटी (धनुष-बाण) रही है जो सदैव अपने पास रखते हैं। जंगल में रहने के कारण कर्नल जेम्स टॉड ने भीलों को वन पुत्र कहा है। भीलों की प्रजाति को लेकर मानवशास्त्रियों में मतभेद है। हैडन इन्हें पूर्व द्रविड, रिजले इन्हें द्रविड़, प्रो. गुहा इन्हें प्रोटो-आस्ट्रोलायड़ प्रजाति से संबंधित मानते हैं। प्रायः मानवशास्त्री इन्हें मुण्डा प्रजाति का वंशज मानते हैं क्योंकि इनकी भाषा में मुण्डारी शब्दों का अधिक प्रयोग किया जाता है। संस्कृत साहित्य में इन्हें निषाद या पुलिन्द जाति से संबंधित माना गया है, जिनकी उत्पत्ति महादेव की एक भील उप पत्नी से उत्पन्न पुत्र निषाद से हुई मानी गई है। ये देश के आदिम निवासी हैं। सी.एस. थॉम्पसन (C.S. Thampson ) ने (1895) में भीली व्याकरण को प्रकाशित किया। इस भाषा के आधार पर वे भीलों को कोलारी आदिवासियों की श्रेणी में रखते हैं। Bhil Art And Culture

 

राजस्थान में भीलों के नाम पर कई कस्बे और नगर बसे हुए हैं। कोटिया भील के नाम पर कोटा, कुशला भील के नाम पर कुशलगढ़, बांसिया भील के नाम पर बाँसवाड़ा एवं डुंगरिया भील के नाम पर डूंगरपुर बसा हुआ है। Bhil Art And Culture

भीलों का सामाजिक संगठन (Social Organisation of Bhils)

भील परिवार पितृसत्तात्मक, पितृस्थानिक एवं पितृवंशीय होता है। भीलों के कई प्रितवंशीय गौत्र होते हैं जिन्हें ‘अटक’ कहा जाता है। गोत्र से आगे यह समुदाय दो उपजनजातियों यथा-उजले भील व मैले भीलों में विभक्त हो जाता है। भीलों में अनेक वर्ग समूह भी पाये जाते हैं जैसे रावत, मसार, पारगी, अहारी, राठौड़, सिसोदिया, चौहान आदि। भीलों में प्रायः विवरणात्मक पद होते हैं। उदाहरण के लिए सम्बोधनात्मक पदों में ‘बा’ (पिता) ‘आई’ (मां) ‘काको’ (चाचा) ‘मोटा वा’ (दादा), ‘बाबा’ (नाना), ‘भाई’ (भाई) ‘माहो’ (फूफा), ‘मामो’ (मामा), ‘सोरो’ (पुत्र),’हाऊ’ (सास) ‘हाहरो’ (सुसराल) इत्यादि सम्मिलित हैं। Bhil Art And Culture

भीलों में विवाह प्रथा (Ways of Acquiring Mates)

  • भीलों  में प्रायः एकल विवाह (Monogamy) प्रथा प्रचलित है। जबकि धनी एवं उच्च वर्ग के भील बहुपत्नी विवाह भी करते हैं। भीलों में विविध प्रकार के विवाह रीतियाँ प्रचलित हैं, जो अन्य जनजातियों में भी पाई जाती है। दक्षिण राजस्थान की जनजातियों में दो पक्षों के मध्य विवाह संबंध में मध्यस्थता करने वाला ‘बड़ालिया’ कहलाता है। भीलों में विवाह के कई प्रकार जैसे मोर बान्दिया विवाह, अपहरण विवाह, देवर विवाह, विनियम विवाह, सेवा विवाह एवं क्रय विवाह के तरीके प्रचलित है। Bhil Art And Culture
  • क्रय विवाह को पद्धति न केवल भील गरासिया जनजाति में वरन् संपूर्ण जनजातीय भारत में वैवाहिक संबंधों के एक लोकप्रिय तरीके के रूप में अत्यधिक प्रचलित है। इनमें कन्या का मूल्य देना पड़ता है, प्रायः भीलों में ‘वधू मूल्य (दापा)’ इस प्रकार के विवाह में केन्द्रीय विषय होता है। इसका भुगतान नकद अथवा किसी वस्तु के रूप में लड़की के पिता को किया जाता है। अगर विवाहिता को कोई दूसरा ले जाये तब ले जाने वाला पूर्वपति को रुपया देगा तथा दापा (वधू मूल्य) पुनः पहले पति के पास आ जायेगा लेकिन यह तब ही आयेगा जब स्त्री ने तलाक दिया है। दोनों पक्षों के सामने वर वधू के दाहिने हाथों को जुड़वाकर पानी के घड़े पर पीपल की पत्तियां रखकर वर-वधु के सात परिक्रमा लगवाई जाती हैं और विवाह सम्पन्न हो जाता है। ‘गोल गाघोड़ों’ के द्वारा कोई भी युवक शूरवीर व साहस का कार्य दिखलाते हुए शादी हेतु युवती को चुनने का अधिकार पाता है। Bhil Art And Culture

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  • भील लोगों में अपहरण विवाह की प्रथा भी प्रचलित है। लड़की का परिवार लड़कों के अपहरण पर वधू मूल्य ग्रहण करता है। इसे  “नोतरा की रकम” भी कहते हैं। भीलों में देवर विवाह, विनिमय विवाह, सेवा विवाह एवं क्रम विवाह की भी प्रथा प्रचलित है। इनमें तलाक प्रथा को छेड़ा फाड़ना प्रथा’ कहा जाता है।
  • इस प्रथा में साड़ी फाड़कर उसमें एक रुपया रखकर पुरुष के संबंधी या पंच स्त्री को दे देते हैं और इस प्रकार तलाक हो जाता है। स्त्री द्वारा तलाक देने पर उसे वधू मूल्य लौटाना पड़ता है। भीलनी अपने पति के छोटे भाई के साथ जब पुर्नविवाह या ‘नातरा’ करती है तो उसे ‘देवर बटा’ कहा जाता है।
  • नातरा करने वाले पुरुष को जिस परिवार की स्वी चली जाती है उसे ‘झगड़ा’ और जिस परिवार की लड़की होती है उसे ‘मायस’ नकद पशुओं या अनाज के रूप में चुकाना पड़ता है। भीलनी के पूर्व पति के बच्चे जो नाते के साथ आते हैं उन्हें ‘गोलड़ / गेलड़’ कहते है। Bhil Art And Culture

आवास व रहन-सहन

  • भील लोग अपने घर को ‘कू’ अथवा ‘टापरा’ कहते हैं। टापरा के बाहर बने बरामदे को ढालिया कहा जाता है। बहुत से झोपड़े मिलकर फलों का निर्माण करते हैं तथा अनेक फलां मिलकर पाल का निर्माण करते हैं। खाद्यान्न संग्रह के लिए मिट्टी के 3-4 ड्रम यानी कवलियां होती है।
  • इन्ही से जुड़ी हुई आटा पिसने की घट्टी होती है। जब किसी भील को अपने खेत की कटाई करनी होती थी तो वह श्रमदान के लिए गाँव के भील परिवारों को आमंत्रित करता था। सहकारिता की यह रस्म हलमा कहलाती थी। हलमा आपात स्थिति में ही आयोजित किया जाता था। गाँव की एकता का यह बहुत बड़ा प्रतीक था। Bhil Art And Culture
पहनावा और आभूषण
  • पहनावा वस्त्रों के आधार पर इनको दो वर्गो में बाटा जा सकता है (1) लंगोटिया भील और (2) पोतीद्दा भील
  • लंगोटिया भील कमर में एक लंगोटी पहनते हैं जिसे ये खोयतू (Khoytu) कहते हैं। इनकी स्त्रियां कछावू (Kacchawo) (घाघरा) पहनती है जो घुटने तक नीचे होते हैं।
  • पोतीद्दा भील तंग धोती पहनते हैं जिसे ढेपाड़ा कहा जाता है तथा शरीर पर पहनी जाने वाले वस्त्र को बांडी/खंडी कहते हैं।

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  • ये लोग घर पर अपनी कमर पर अंगोछा लपेटे रहते हैं जिसे फालू (Falu) कहा जाता है। भील सिर पर साफा बांधते है। उस पर एक रंगीन पट्टी भी बांध लेते है, जिसे ‘जाड्या कहते हैं। Bhil Art And Culture
  • इनकी स्त्रियां प्राय लाल या काले रंग का तंग ब्लाउज पहनती है, जिसे कछाबू कहा जाता है। भील स्त्रियों की पोशाक घाघरा (लंहगा), साड़ी (हाडला) और कब्जा है। आदिवासी अंचल में यह कपड़ा सप्ता या टूल के नाम से प्रचलित है।
  • पहली साड़ी लाल और पीले रंग की होती है। रंग की यह छपाई छीपें करते इसे गवन साड़ी के नाम से जानते है। दूसरी साड़ी मलकापुरी है। Bhil Art And Culture
  • यह सूती होती है। तीसरी साड़ी ‘चुनरी’ होती है। चौथे प्रकार की साड़ी अंगूछा कहलाती है। अविवाहित भील लड़कियां ओढ़नी पहनती है। ओढ़नियां दो प्रकार की होती हैं।
  • इसे पावली भांत अर्थात् चवन्नी छाप ओढ़नी कहते हैं तथा दूसरी ओढ़नी चीरम भांत कहलाती है।Bhil Art And Culture
आभूषण :
  1. भील स्त्री-पुरुषों को गोदना गुदाने का बड़ा चाव रहता है। स्त्रियां गले में चांदी की हंसली या जंजीर, नाक में नथ, कानों में चांदी की बालियां, हाथों में छल्ले तथा सिर पर बोट और पावों में पीतल की पैजनियां पहनती हैं। इन गहनों को ‘पींजनिया व बड़ार’ कहते है दुलहन जिस लंहगे को पहनती हैं वह पीरिया कहलाता है। साड़ी का रंग लाल सूती होता है इसे सिन्दूरी कहते हैं। दुल्हा एक लम्बा आंगा शेरवानी किस्म का पहनता है। Bhil Art And Culture
खान-पान व नृत्यसंगीत

खान-पान भीलों के भोजन में मक्का को रोटी एवं कांदे (प्याज) का भात मुख्य होता है। ये मांसाहारी होते है। भील पुरुष व स्त्रियां दोनों ही शराब पीते हैं तथा शराब पीने के बहुत शौकीन होते द्वारा की जाने वाली स्थानांतरित कृषि ‘वालरा / वालरू’ कहलाती है। ये लोग अनाज का संग्रहण ‘सोहरी’ (कोठी) में करते हैं। Bhil Art And Culture

 

राजनीतिक संगठन

  • गरासिया जनजाति अपने-अपने पाल या ‘चोखला’ में पंचायतों का गठन करती है। इसका प्रधान या पटेल गाँव का मुखिया होता है। गाँवों में सबसे छोटी इकाई फालिया है। पाल का मुखिया ‘पावली’ कहलाता है, यह पद प्रायः पैतृक होता है। हैं। Bhil Art And Culture
  • महुआ से बनी शराब “मोकडी तथा ताड़ी को ये बड़े चाव से पीते हैं। महुआ इनके लिए देववृक्ष के समान है। भील के घर में एक लकड़ी की कठौती, एक पानी भरने का मिट्टी का पड़ाव एक मिट्टी का तवा (केलड़ी) एक सब्जी की हाँडी, एक लकड़ी की चम्मच चाटू) होता है। Bhil Art And Culture
नृत्य-संगीत :
  • भीलों के नृत्यों में हाथीमना नृत्य प्रसिद्ध है। इसके अलावा गैर या धण्णा, नेजा, गवरी युद्ध नृत्य, भगोरिया नृत्य, लाही नृत्य, ढोल नृत्य तथा शिकार नृत्य भीलों के प्रमुख नृत्य है। मल जनजाति में एक खेल गीड़ा डोटी हैं।

भीलों का संगठन

  • भील स्वभाव से बड़े निडर, वीर एवं साहसी होते हैं. धनुष-बाण, तलवार एवं खंजर इनके प्रमुख अस्त्र-शस्त्र है। वाण दो प्रकार के होते है-एक ‘हरिया’ व दूसरा ‘बिदा’। पक्षियों को पकड़ने के लिए एक प्रकार का फंदा जिसे ‘फटकिया’ कहा जाता हैं, काम में लिया जाता है जब कभी भी इन्हें खतरा महसूस होता है तो “ब” (ढोल) बजाते हैं या किलकारी मारते हैं तथा
  • फाइरे, फाइरे भीलों का रणघोष है। रणघोष होते ही सभी भील हथियार लेकर एकदम इकट हो जाते हैं और खतरे का सामना करते हैं। यदि कोई भील किसी सैनिक के घोड़े को मार लेता है तो वह ‘पाखरिया’ कहलाता है मार्गदर्शक को वे ‘बोलावा’ कहते हैं। किसी अजनबी द्वारा भील को ‘पाड़ा’ कहकर पुकारा जाता है तो
  • भील बहुत खुश होता है लेकिन ‘काँड़ी’ कह दिया तो भील उसे गाली मानता है। आर्थिक जीवन प्रिमिटिव कल्टीवेशन (आदिम कृषि) भील वनों एवं पहाड़ी प्रदेशों के एकांत प्रदेशों में निवास करने के कारण इनकी आजीविका का मुख्य आधार खाद्य संग्रहण, आखेट, आदिम कषि एवं पशुपालन है।
  • भील स्वभाव से घुमक्कड़ एवं म कृषि करने वाले होते हैं। ये पहाड़ी ढालों के वनों को जलाकर प्राप्त की गई भूमि में वर्षा काल में अनाज, दालें, सब्जियां बोते हैं। इस प्रकार की खेती को चिमाता (Chimata) कहते हैं।
  • समतल भूमि का अभाव और भूमि के कटाव की अधिकता के कारण कई भागों में स्थानान्तरित कृषि (Shifiting Agriculture) की जाती है, जिसे ‘बालरा’ कहते हैं।
  • मैदानी भागों में भी वनों को काटकर भूमि में अनाज, मक्का, मिर्ची, ज्वार आदि बोये जाते हैं इस प्रकार की खेती को ‘दाजिया’ (Dijia) कहा जाता है। Bhil Art And Culture
  • पहाड़ी ढलानों पर की जाने वाली ऐसी कृषि को ‘चिमाता’ कहा जाता है। यह खेती करने की विधि भीलों में बहुत प्रचलित है। अरावली के यह भाग स्वाधीनता प्राप्ति के पूर्व ‘जंगल एवं काला पानी’ कहलाते थे।
  • मुख्यतः जलवायु खराब होने से यहां मलेरिया, नारू, संग्रहणी आदि कई बीमारियां लोगों को हो जाती हैं। ऐसी ही दुःखद जलवायु में ये प्रकृति पुत्र सदियों से निवास करते रहे हैं।
  • आदिवासी, वनवासी या वन्यस्थली पुत्र भील के लिए वन ही जो का बहुत बड़ा सहारा है। वनों से इनको मकान बनाने, जलाने, खेती के औजार बनाने के लिए लकड़ी एवं अन्य वनों से प्राप्त होने वाली वस्तुए (गोंद, लाख, लकड़ी, जड़ी-बूटिया) बेचकर थोड़ा बहुत पैसा प्राप्त कर लेते हैं। ये लोग सदैव ऋण में डूबे रहते हैं। सेठ साहूकार पीढ़ी-दर-पी इन पर सूद चढ़ाते रहते हैं एवं ये लोग उनके यहां कार्य करते रहते है कार्य करने की इस प्रथा को ‘सागड़ी प्रथा’ कहते हैं।
  • इनके लड़के-लड़कियां एवं स्वियां फूड गैदरिंग (अर्थात् कदे मूल इकट्ठा करना) भी करते हैं। चिड़ियाओं को पकड़ने के लिए एक जाल होती है। जिसे फटकिया कहते है। इस जाल से पक्षियों को जाता है। भीलों में गोफन का प्रयोग बहुत अधिक है। गोफन सन (जुट) से गंथी जाती है। इसमें पत्थर रखकर खेत से चिड़ियाओं को जाता है। कभी-कभी इसका वार मनुष्यों पर भी हो जाता है।Bhil Art And Culture

भीलों का राजनैतिक संगठन

  1. भील जनजाति की मूल इकाई परिवार है एवं परिवार में मुखिया सर्व होता है। आठ-दस परिवार मिलकर छोटे-छोटे समूह बनाते है। जिन्हें फलां कहा जाता है, फलां का मुखिया तदवी या वंशाओं कहलाता है। चार-छः फलां मिलकर पाल का निर्माण करते हैं, जिसमें सभी एकगोत्रीय होते हैं। पाल का मुखिया गमेती या ‘पालजी’ कहलाता है,
  2. जिसका पद वंशानुगत (पैतृक होता है गमेती शब्द उदयपुर व हूँगरपुर में प्रचलित है जबकि बाँसवाड़ा में पटेल या रावत शब्द प्रचलित है। एक तरह से रावत गांव स्तर पर जागीरदार का प्रतिनिधि हा जब गांव में कोई झगड़ा फसाद होता है, तो इन सब मामलों का निर्णय ये परम्परागत आदिवासी नेता करते आये हैं।
  3. इन्हें भांजगड़िया अर्थात् समझौता करवाने वाला नेता कहते हैं भांजगडिये का निर्णय अंतिम एवं मान्य होता है। भीलों में पंचायत प्रधान होती है, जिसका मुखिया गमेती होता है। अब 2 अक्टूबर सन् 1959 से पंचायती राज की स्थापना के बाद राज्य में पंच, सरपंच, प्रधान आदि मुखिया हो गये हैं।Bhil Art And Culture
  4. गाँव का दूसरा महत्वपूर्ण व्यक्ति भोपा या देवाली होता है। भोपा देवी-देवताओं, जादू-टोना, झाड़ा-फूंका आदि के काम करता है और लोगों के दुःख-दर्द इसी प्रकार कम करता है। अब भोपों का स्थान ब्राह्मणों ने ले लिया है। पाल का तीसरा महत्वपूर्ण व्यक्ति भगत होता है जो धार्मिक सामाजिक संस्कारों को सम्पन्न करता है लेकिन वर्तमान में हिन्दू पंडितों ने यहाँ अपनी पहुँच बना ली है। हिन्दू धर्म के सम्पर्क में आने से बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर के भील स्वर्ग-नरक में विश्वास करने वाले भील ‘भगत’ भील कहलाते हैं।
  5. भगत भील हिन्दू देवी-देवताओं को मानते हैं। ये मुर्दा को जलाते हैं तथा बारहवें दिन चावल पकाकर भोज देते हैं विवाह में ‘दापा’ के स्थान पर ‘कन्यादान’ करते हैं। भगत भील अपने आपको अभगत भीलों से श्रेष्ठ एवं ऊँचा मानते हैं। भगत भील मांस, मदिरा का सेवन नहीं करते हैं।

 

धार्मिक संगठन

  1. भील देवी-देवताओं, महादेवजी, केसरियानाथ, भैरोंजी एवं खाखलदेव (आय) में बहुत विश्वास करते हैं। भीलों में स्त्रियों में ‘सगड़ी या डाइन’ का शक हो जाने पर उससे बच्चों को बचाते रहते हैं। कभी-कभी उसे मार भी डालते हैं। जादू-टोनों में भी भील बहुत विश्वास करते हैं।
  2. बहुधा उनको खुश करने के लिए ये लोग बकरे, भेड़ों या भैंसों का बलिदान भी करते हैं। भीलों के प्रमुख देवता इन्द्रराज, बागदेव, बाराबीज, गोराजी, कालाजी, गोपालदेव, खेतरपाल, सतीमाता, मारिया माता, बेरिया माता, काली माता, सीतला माता, मोती माता, भैरूजी, हिम्मारियों आदि है।
  3. मुख्य रूप से भील शिव के उपासक हैं एवं इन्हें अपना आदिदेव मानते हैं। भील अपने को महादेव का चोर भी कहते हैं। भीलों के स्थानीय देवों में बड़का देव, दूल्हा देव, भैंसासुर, मसान देव बाबा देव, कालिका आदि मुख्य देव हैं।
  4. भोपा/देवाली भी इनका धर्म है। घर में बीमार होने पर कौआ का बोलना अशुभ माना जाता है। भोपा या भगत भूतप्रेतों एवं चूड़ेलों के प्रभाव से रक्षा करने में सहायक होता है।
  5. इसलिए हर गांव, पाल में एक भोपा अवश्य होता है। मीताणा प्रथा किसी व्यक्ति की संदिग्ध मृत्यु होने पर मृत्यु स्थान के स्वामी से जब तक हर्जाना न वसूला जाए तब तक मृत व्यक्ति के शरीर को वहीं रखा जाता है। हर्जाने का फैसला पंचायत ही तय करती है। यह प्रथा लगभग सभी जनजातियों में पायी जाती है। Bhil Art And Culture

साहित्य :

भील जनजाति के साहित्यों में लुढ़का चौथ, भील ने बदला लिया, दयालु मछली, भील की प्रतिज्ञा, साहसी राजकुमार, आधा मनुष्य, पाँच आदि प्रमुख हैं। लहू, भगवान शंकर की सवारी, राजा का न्याय भील समाज सुधारक गोविन्दगिरी बंजारा (डूंगरपुर), मामा : बालेश्वर दयाल (बाँसवाड़ा), संत मावजी, सुरमालदास, मोतीलाल तेजावत आदि भील समाज सुधारक हुए हैं। सरकारी आरक्षण योजना का भी भील लोग अधिक लाभ नहीं ले पाये। अब इन पर ईसाई मिशनरियों का प्रभाव भी पड़ता जा रहा है भगत आंदोलन के प्रवर्तक सरमलदास तथा गोबिन्द गिरि के प्रभाव के कारण ये लोग हिन्दू धर्म के समीप आये हैं। सामाजिक कुरूतियों में भी कमी आई है। Bhil Art And Culture

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