1857 का विद्रोह | आधुनिक भारत का इतिहास | 1857 Revolt in Hindi

1857 का विद्रोह-1857 ki kranti- क्रांति  

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1857 का विद्रोह:-

1857 का विद्रोह-1857 ki kranti- क्रांति  

  • पलासी युद्ध (1757 में) के पश्चात्, ब्रिटिश शासन ने उत्तरी भारत में प्ला सर्विस एवं सत्ता हासिल करने की ओर पहला कदम बढ़ाया। 1757 के पश्चात् औपनिवेशिक शासन द्वारा अपनाई गई नीतियों और उसके स्वरूप के विरुद्ध असंतोष के रूप में 1857 का प्रथम बड़ा एवं व्यापक विद्रोह हुआ, जिसके पश्चात् भारत पर ब्रिटिश शासन की नीतियों में परिवर्तन किए गए।
  • 123 धीमी गति से बढ़ता असंतोष ब्रिटिश विस्तारवादी नीतियों, आर्थिक शोषण और विभिन्न वर्षों में प्रशासनिक नवोन्मेषों ने भारतीय राज्यों के शासकों, सिपाहियों, जमींदारों, किसानों, व्यापारियों, शिल्पकारों, पंडितों, मौलवियों इत्यादि की स्थिति को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया। यह धीमी गति से बढ़ता असंतोष 1857 में एक हिंसक विद्रोह के रूप में भड़का, जिसने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी।
  • हालांकि, 1757-1857 की अवधि शांतिपूर्ण एवं कठिनाई मुक्त नहीं थी। इस दौरान धार्मिक राजनीतिक हिंसा, जनजाति विद्रोह, किसान विद्रोह एवं दंगे तथा असैन्य / नागरिक विद्रोह के रूप में छिटपुट लोकप्रिय विद्रोहों की एक श्रृंखला देखी गई। आदिवासी, अंग्रेजों की भूमि बंदोबस्त नीतियों से असंतुष्ट एवं नाराज थे, जिसने उनकी संयुक्त स्वामित्व परंपरा के विरुद्ध जाकर, सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया। बढ़ी हुई राजस्व मांगों यहां तक कि अकाल के वर्षों में भी ने जनाक्रोश को जन्म दिया। कई बार स्थानीय महाजनों के विरुद्ध आंदोलन कंपनी शासन के विरुद्ध विद्रोह बन गया; जैसाकि महाजनों को पुलिस का समर्थन प्राप्त था। उनके धर्म एवं परंपरागत प्रथाओं में अंग्रेजों द्वारा अनावश्यक हस्तक्षेप ने भी रोष में वृद्धि को जिसके परिणामस्वरूप विद्रोह भड़के ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के बेहद शुरुआती दिनों में उनके विरुद्ध विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न कारणों से विद्रोह हुए कुछ आंदोलन 1857 के विद्रोह के पश्चात भी जारी रहे। दक्षिण, पूर्व पश्चिम एवं पूर्वोत्तर क्षेत्रों में महत्वपूर्ण विद्रोह हुए. जिन्हें कंपनी ने वर्बरतापूर्वक कुचल दिया।
1857 का विद्राहः मुख्य कारण
  • 1857 का भारतीय विद्रोह, जिसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, सिपाही विद्रोह और भारतीय विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है, ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक सशस्त्र विद्रोह था। यह विद्रोह दो वर्षो तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चला। इस विवाह का आरंभ छावनी क्षेत्रों में छोटी झड़पों तथा आगजनी से हुआ था परंतु कुछ समय पश्चात् इसने एक बड़ा रूप ले लिया। विद्रोह का अंत भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन की समाप्ति के साथ हुआ, और पूरे भारत पर ब्रिटिश क्राउन का प्रत्यक्ष शासन आरंभ हो गया। अन्य प्रमुख एवं पहले के विद्रोहों की 1857 के विद्रोह के विभिन्न राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक, सैनिक तथा सामाजिक कारण थे।
आर्थिक कारण
  • ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के उद्योग-धंधों को नष्ट कर दिया तथा श्रमिकों से बलपूर्वक अधिक से अधिक श्रम कराकर उन्हें कम पारिश्रमिक देना प्रारंभ किया। इसके अतिरिक्त अकाल और बाद की स्थिति में भारतीयों की किसी भी प्रकार की सहायता नहीं की जाती थी, और उन्हें अपने हाल पर मरने के लिए छोड़ दिया जाता था। सन 1813 में कंपनी ने एकतरफा मुक्त व्यापार की नीति अपना ली। इसके अंतर्गत ब्रिटिश व्यापारियों को आयात करने की पूरी छूट मिल गई। परंपरागत तकनीक से बनी हुई भारतीय वस्तुएं इसके सामने टिक नहीं सकीं. और भारतीय हस्तशिल्प व्यापार की अकल्पनीय क्षति हुई।
  • भारतीय व्यापार एवं व्यापारी वर्ग को ब्रिटिश शासन द्वारा जानबूझकर बर्बाद कर दिया गया, जिन्होंने भारत में बनी चीजों पर उच्च करारोपण प्रशुल्क लगाए। उसी समय, ब्रिटेन में बनी वस्तुओं पर निम्न कर लगाकर उन्हें भारत में आयात करके प्रोत्साहित किया गया। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक भारत से कपास एवं सिल्क के कपड़ों का निर्यात वस्तुतः समाप्त हो चुका था। मुक्त व्यापार एवं ब्रिटेन से आने वाली मशीन निर्मित वस्तुओं के विरुद्ध रक्षात्मक करों को लगाने से इनकार ने भारतीय विनिर्माण क्षेत्र को समाप्त कर दिया।
  • रेल सेवा के आने के साथ ही ग्रामीण क्षेत्र के लघु उद्यम भी नष्ट हो गए। रेल ने ब्रिटिश व्यापारियों को दूर-दराज के गांवों तक पहुंच दे दी। सर्वाधिक अति कपड़ा उद्योग (कपास और रेशम) को हुई। 18वीं और 19वीं शताब्दी में ब्रिटेन और यूरोप में आयात कर और अनेक रुकावटों के चलते भारतीय निर्यात हो गया। पारंपरिक उद्योगों के नष्ट होने और साथ-साथ आधुनिक उ का विकास न होने के कारण यह स्थिति अधिक विषम हो गई।
  • यह ब्रिटिश घुसपैठ थी जिसने भारतीय दस्तकारी / हथकरघा को छिन्न-भिन्न कर दिया और चरखे को समाप्त कर दिया। इंग्लैंड ने भारतीय सूती वस्त्रों को यूरोपीय बाजार से बाहर कर दिया, जिसने हिंदुस्तान में एक नाटकीय मोड़ प्रारंभ किया और अंततः कपास / सूती वस्त्र के जनक देश को सूती वस्त्रों से पाट दिया।

 कार्ल मार्क्स, 1853 में

  • कंपनी ने खेती के सुधार पर बेहद कम खर्च किया, और अधिकतर लगान कंपनी के खचों को पूरा करने में प्रयोग होता था। ब्रिटिश कानून व्यवस्था के अंतर्गत भूमि हस्तांतरण वैध हो जाने के कारण किसानों को अपनी भूमि से भी हाथ धोना पड़ता था।
  • निम्न वर्गीय कृषकों तथा मजदूरों की स्थिति तो दयनीय थी हो, राजाओं और नवाबों तक की आर्थिक स्थिति बदहाल थी। भारत से प्राप्त खनिज संसाधनों और सस्ते श्रम के बल पर अंग्रेजों ने अपने उद्योग-धंधों को विकास के चरम पर पहुचा दिया; जबकि दूसरी ओर भारत में किसी नए उद्योग की स्थापना की बात तो दूर, छोटे-छोटे कुटीर उद्योगों को भी समाप्त कर दिया गया। इससे भारत के प्रत्येक वर्ग में अंग्रेजों के प्रति अविश्वास की भावना उत्पन्न हुई, और वे व्यापक विद्रोह के सूत्रधार बन गए।
राजनेतिक कारण
  • ईस्ट इंडिया कंपनी की ‘प्रभावी नियंत्रण’, ‘सहायक संधि’ और ‘व्यपगत का सिद्धांत’ जैसी नीतियों ने जन असंतोष एवं विप्लव को बढ़ावा दिया।
  • वेलेजली ने भारतीय राज्यों को अंग्रेजी राजनैतिक परिधि में लाने के लिए सहायक संधि प्रणाली का प्रयोग किया। इस प्रणाली ने भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के प्रसार में विशेष भूमिका निभाई और उन्हें भारत का एक विस्तृत क्षेत्र हाथ लगा। इस कारण भारतीय राज्य अपनी स्वतंत्रता खो बैठे।
  • गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी के शासनकाल में भारत के कुछ प्रमुख देशी राज्यों, यथा-झांसी, उदयपुर, संभलपुर, नागपुर आदि के राजाओं के कोई पुत्र नहीं थे। – प्राचीन भारतीय राजव्यवस्था के प्रावधानों के तहत योग्य उत्तराधिकारी के चयन के लिए ये राजा अपने मनोनुकूल किसी बच्चे को गोद ले सकते थे। परंतु डलहौजी ने गोद लेने की इस प्रथा को अमान्य घोषित कर इन देशी राज्यों (रियासतों) को कंपनी के शासनाधिकार में ले लिया। कंपनी द्वारा शुरू की गई इस नयी नीति से सभी राजा असंतुष्ट थे, और वे किसी ऐसे अवसर की तलाश में थे, जब पुनः अंग्रेजों को दबाकर अपनी रियासत पर अधिकार जमा सकें।
प्रशासनिक कारण..
  • कंपनी प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार, विशिष्ट रूप से पुलिस, निम्न अधिकारियों एवं अधीनस्थ अदालतों में असंतोष का एक मुख्य कारण था। दरअसल, कई इतिहासकारों का मत है, कि आज हम जो भ्रष्टाचार भारत में देखते हैं, कंपनी शासन की देन है। साथ ही भारतीयों की नजर में ब्रिटिश शासन का चरित्र विदेशी शासन का था। वह
सामाजिक-धार्मिक कारण
  • कंपनी के शासन विस्तार के साथ-साथ अंग्रेजों ने भारतीयों के साथ अमानुषिक व्यवहार करना प्रारंभ कर दिया था। काले और गोरे का भेद स्पष्ट रूप से उभरने लगा था। अंग्रेजों द्वारा भारतीयों को गुलाम समझा जाता था। समाज में अंग्रेजों के प्रति उपेक्षा की भावना बहुत अधिक बढ़ गई थी. क्योंकि उनके रहन-सहन, अन्य व्यवहार एवं उद्योग आविष्कार से भारतीय व्यक्तियों की सामाजिक मान्यताओं में अंतर पड़ता था। अपने सामाजिक जीवन में वे अंग्रेजों का प्रभाव स्वीकार नहीं करना चाहते थे। अंग्रेजों की खुद को श्रेष्ठ और भारतीयों को हीन समझने की भावना ने भारतीयों को क्रांति करने की प्रेरणा प्रदान की।
  • अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में भारतीयों पर धार्मिक दृष्टि से भी कुठाराघात किया था। इस काल में योग्यता की जगह धर्म को पद का आधार बनाया गया। जो कोई भी भारतीय ईसाई धर्म को अपना लेता था, उसकी पदोन्नति कर दी जाती थी, जबकि भारतीय धर्म का अनुपालन करने वाले को सभी प्रकार से अपमानित किया जाता था। इससे भारतीय जनसाधारण के बीच अंग्रेजों के प्रति धार्मिक असहिष्णुता उत्पन्न हो गई। फिर ईसाई धर्म का इतना अधिक प्रचार किया गया, कि भारतीयों को यह संदेह होने लगा, कि अंग्रेज उनके धर्म का सर्वनाश करना चाहते हैं। परिणामस्वरूप भारतवासी अंग्रेजों को धर्मद्रोही समझकर उन्हें देश से बाहर निकालने का मार्ग ढूंढने लगे, और 1857 में जब मौका मिला तब हिंदुओं और मुसलमानों ने मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति की।
बाहरी घटनाओं का प्रभाव
  • 1857 का विद्रोह कुछ बाहरी घटनाओं प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध (1838-42), पंजाब युद्ध (1845-49) एवं क्रीमिया बुद्ध (1854-56)- जिसमें अंग्रेजों को भारी हानि हुई थी, से भी प्रेरित हुआ। इससे भारतीयों को इस धारणा से उबरने का अवसर मिला, कि अंग्रेज अपराजेय हैं। भारत के क्रांतिकारियों को इस युद्ध से नवीन आशा एवं प्रेरणा मिली कि हम भी अंग्रेजों को देश से निकाल सकते हैं, और इसके लिए उन्होंने विद्रोह शुरू कर दिया।
सिपाहियों के बीच असंतोष
  • सिपाही मूलत: कंपनी की बंगाल सेना में काम करने वाले भारतीय मूल के सैनिक थे। बॉम्बे मद्रास और बंगाल प्रेजिडेंसी की अपनी अलग सेना और सेना प्रमुख होता था। इस सेना में ब्रिटिश सेना से अधिक सिपाही थे। वर्ष 1857 में इस सेना में 2.57,000 सिपाही थे। बॉम्बे और मद्रास प्रेजिडेंसी की सेना में अलग-अलग क्षेत्रों के लोग होने के कारण ये सेनाएं विभिन्नता से पूर्ण थीं और इनमें किसी एक क्षेत्र के लोगों का प्रभुत्व नहीं था। लेकिन बंगाल प्रेसीडेंसी की सेना में भर्ती होने वाले सैनिक मुख्यतः अवध और गंगा के मैदानी क्षेत्रों के भूमिहार ब्राह्मण और राजपूत थे। कंपनी के प्रारंभिक वर्षों में बंगाल सेना में जातिगत विशेषाधिकारों और रीति-रिवाजों को महत्व दिया जाता था, परंतु सन 1840 के पश्चात् कलकत्ता में आधुनिकता पसंद सरकार के आने के पश्चात् सिपाहियों में अपनी जाति खोने की आशंका बढ़ गई। सेना में सिपाहियों को जाति और धर्म से संबंधित चिह्न धारण करने से मना कर दिया गया। सन 1856 में एक आदेश के अंतर्गत सभी नए भर्ती सिपाहियों को विदेश में कुछ समय के लिए काम करना अनिवार्य कर दिया गया। सिपाही धीरे-धीरे सैन्य-जीवन के विभिन्न पहलुओं से असंतुष्ट हो चुके थे। सेना का वेतन कम था। भारतीय सैनिकों का वेतन मात्र सात रुपये प्रतिमाह था। अवध और पंजाब जीतने के पश्चात् सिपाहियों का भत्ता भी समाप्त कर दिया गया था। एनफील्ड बंदूक के बारे में फैली अफवाहों ने सिपाहियों की आशंका को अधिक बढ़ा दिया, कि कंपनी उनका धर्म और जाति परिवर्तन करना चाहती है।
  • अंततः, ब्रिटिश भारतीय सेना में विद्रोहों बंगाल (1764), वेल्लौर (1806). बैरकपुर (1825) और अफगान युद्ध (1838-42) के दौरान का एक लंबा इतिहास है, जिसमें से ये कुछ हैं।
  • अफवाहें इस समय एक अफवाह फैली थी कि कंपनी का शासन 1757 में प्लासी के युद्ध से प्रारंभ हुआ था, और सन 1857 में 100 वर्षों के पश्चात् समाप्त हो जाएगा। चपातियां और कमल के फूल भारत के अनेक भागों में वितरित होने लगे। ये आने वाले विद्रोह के लक्षण थे।
विद्रोह का प्रारंभ एवं विस्तार
विद्रोह की चिंगारी
  • आर्ट में हड्डियों के चूर्ण की मिलावट और एनफील्ड बंदूकों के लाए जाने की खबरों ने सरकार के साथ सिपाहियों के मन-मुटाव को बढ़ा दिया। नई एनफील्ड बंदूक भरने के लिए कारतूस को दांतों से काटकर खोलना पड़ता था, और उसमें
  • भरे हुए वारूद को बंदूक की नली में भरकर कारतूस को डालना पड़ता था। कारतूस के बाहरी आवरण में चर्बी होती थी, जोकि उसे सीलन से बचाती थी। सिपाहियों के बीच अफवाह फैल चुकी थी कि कारतूस में लगी हुई सूअर और गाय के मांस से बनाई जाती है। यह हिंदू और मुसलमान सिरियों की धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध था। गाय हिंदुओं के लिए पवित्र थी जबकि की हत्या मुसलमानों के लिए वर्जित थी। सूअर
  • चर्बी वाले कारतूसों ने सेना में असंतोष के नए कारण को पैदा नहीं किया धीमी गति से बढ़ते असंतोष को खुलकर बाहर आने का अवसर प्रदान किया। सबसे पहले बैरकपुर छावनी में मंगल पांडे ने 29 मार्च, 1857 को ऐसे कारतूस के प्रयोग का विरोध किया। उसने काफी उत्पात मचाया 8 अप्रैल, 1857 को उसे फांसी दे दी गई। 6 मई को सैनिकों ने फिर विरोध किया। अब कंपनी ने भारतीय सैनिकों का रुख देखते हुए उनके शस्त्रास्त्र जब्त करना आरंभ कर दिया; सैनिकों को सजा दी जाने लगी, और उन्हें बड़ी संख्या में कैद किया जाने लगा। अंत में, 10 मई, 1857 को सैनिकों ने व्यापक स्तर पर विरोध कर विद्रोह की घोषणा कर दी और क्रांति की शुरुआत हो गई।
  • क्रांति की शुरुआत
  • 1857 की क्रांति का सूत्रपात वैरकपुर छावनी के स्वतंत्रता प्रेमी सैनिक मंगल पांडे ने किया। 29 मार्च, 1857 को नए कारतूसों के प्रयोग के विरुद्ध मंगल पांडे ने आवाज उठाई। ध्यातव्य है कि अंग्रेजी सरकार ने भारतीय सेना के उपयोग के लिए जिन नए कारतूसों को उपलब्ध कराया था, उनमें सूअर और गाय की चर्बी का प्रयोग किया गया था।
  • छावनी के भीतर मंगल पांडे को पकड़ने के लिए जो अंग्रेज अधिकारी आगे बढ़े, उसने मौत के घाट उतार दिया। 8 अप्रैल, 1857 को मंगल पांडे को फांसी की सजा दी गई।
  • यह खबर सुनकर संपूर्ण देश में क्रांति का माहौल स्थापित हो गया। 6 मई, 1857 को भारतीय सैनिकों ने फिर नए कारतूसों के प्रयोग का विरोध किया। विरोध करने वाले सैनिकों को 10 वर्षों के कैद की सजा मिली।
  • सैनिकों से हथियार छीन लिए गए। हथियार छीने जाने को मेरठ में पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं ने भी अपमान का विषय समझा। ऐसी स्थिति में सैनिकों के लिए अंग्रेजों से बदला लेना परम कर्तव्य हो गया।
  • मेरठ के सैनिकों ने 10 मई 1957 को ही जेलों को तोड़ना, भारतीय सैनिकों को मुक्त कराना और अंग्रेजों को मारना शुरू कर दिया। मेरठ में मिली सफलता से उत्साहित सैनिक दिल्ली की ओर बड़े। दिल्ली आकर क्रांतिकारी सैनिकों ने कर्नल रिप्ले की हत्या कर दी. और दिल्ली पर अपना अधिकार जमा लिया।
  • इसी समय अलीगढ़ इटावा, आजमगढ़ गोरखपुर, बुलंदशहर आदि में भी स्वतंत्रता की घोषणा की जा चुकी थी।
  • | सांकेतिक नेता / प्रमुख के रूप • बहादुरशाह जफर का चुनाव दिल्ली में स्थानीय इन्फैंट्री विद्रोहियों में शामिल हो गई, और उन्होंने राजनीतिक एजेंट, साइमन फेजर सहित अपने कई यूरोपीय अधिकारियों की हत्या कर दी. तथा और शहर पर कब्जा कर लिया। लेफ्टिनेंट विलोबी, जो दिल्ली में आयुधागार के प्रभारी थे, ने कुछ हद तक विद्रोहियों का मुकाबला किया, लेकिन जल्द ही धराशायी हो गए। वृद्ध एवं शक्तिहीन बहादुरशाह जफर को भारत का शासक घोषित किया गया।
  • जल्द ही दिल्ली इस महान क्रांति का केंद्र बन गई, और बहादुरशाह इसके प्रतीक बन गए। देश के नेतृत्व के लिए अंतिम मुगल शासक का स्वाभाविक उत्थान इस तथ्य की पुष्टि करता है, कि मुगल वंश का लंबा शासन भारत की राजनीतिक एकता का परंपरागत प्रतीक चिह्न बन गया था। इस एकमात्र कार्य से सिपाहियों ने सिपाही विद्रोह को क्रांतिकारी युद्ध में तब्दील कर दिया; जबकि सभी भारतीय रजवाड़ों के शासकों ने, जिन्होंने विद्रोह में भाग लिया. जल्द ही मुगल शासक के प्रति अपनी निष्ठा की घोषणा की। यह भी महत्वपूर्ण है कि विद्रोही राजनैतिक रूप से प्रोत्साहित एवं प्रेरित थे। यद्यपि धर्म एक कारक था। विद्रोहियों का व्यापक दृष्टिकोण धार्मिक पहचान से प्रभावित नहीं था अपितु इस बात की अवधारणा से प्रभावित था कि अंग्रेजी शासन उनका साझा शत्रु है।
  • बहादुरशाह जफर ने शुरुआती हिचकिचाहट के पश्चात्, भारत के सभी प्रमुखों एवं शासकों को पत्र लिखा और उन्हें ब्रिटिश शासन से लड़ने तथा प्रतिस्थापित करने हेतु भारतीय राज्य का एक परिसंघ संगठित करने के लिए प्रेरित किया। समस्त बंगाल सेना ने जल्द ही विद्रोह की आवाज बुलंद की जो तेजी से फैल गई। अवध, रोहेलखंड, दोआब, बुंदेलखंड, मध्य भारत, बिहार का अधिकांश भाग और पूर्वी पंजाब ने ब्रिटिश शासन की जड़ें हिला दीं।
विद्रोह में लोगों की सहभागिता
  • सिपाहियों के विद्रोह को आम लोगों का समर्थन मिला, विशेष रूप से उत्तर-पश्चिमी प्रांतों तथा अवध का उन्हें लंबे समय से एकत्रित असंतोष की अभिव्यक्ति का अवसर मिल गया, और उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विरोध की अभिव्यक्ति हेतु एक साथ आवाज बुलंद की।
  • विद्रोह में किसानों, दस्तकारों, दुकानदारों, दिहाड़ी मजदूरों, जमींदारों, धार्मिक भिक्षुओं, पुजारियों तथा लोक अधिकारियों की व्यापक सहभागिता रही, जिसने इसे शक्ति देने के साथ-साथ लोकप्रिय विद्रोह
  • का रूप भी प्रदान किया। यहां किसानों एवं छोटे जमींदारों ने अपने असंतोष को अभिव्यक्ति देने के लिए महाजनों एवं जमींदारों पर हमले किए, जिन्होंने उन्हें उनकी जमीन से बेदखल किया था। उन्होंने महाजनों के लेखों एवं ऋण संबंधी अभिलेखों को नष्ट करने के लिए विद्रोह का लाभ उठाया।
  • उन्होंने ब्रिटिश शासन द्वारा स्थापित न्यायालयों, राजस्व कार्यालयों (तहसीलों), राजस्व अभिलेखों तथा पुलिस स्टेशनों पर भी हमले किए।
  • एक आकलन के अनुसार, अवध में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले लगभग 150,000 पुरुषों में से 1,00,000 से अधिक आम नागरिक थे। दिल्ली पर कब्जा करने के एक माह के भीतर विद्रोह देश के विभिन्न भागों में फैल गया।
 विद्रोह के प्रमुख केंद्र एवं नेतृत्वकर्ता
  • यद्यपि 1857 के विद्रोह का नेतृत्व दिल्ली के सम्राट बहादुरशाह जफर कर रहे थे. परंतु यह नेतृत्व औपचारिक एवं नाममात्र का था। विद्रोह का वास्तविक नेतृत्व जनरल बख्त खां के हाथों में था, जो बरेली के सैन्य विद्रोह के अगुआ थे तथा बाद में अपने सैन्य साथियों के साथ दिल्ली पहुंचे थे।
  • बख्त खां के नेतृत्व वाले दल में प्रमुख रूप से 10 सदस्य थे, जिनमें से सेना के छः तथा चार नागरिक विभाग से थे। यह दल सम्राट के नाम से राज्य के मामलों का संचालन करता था। बहादुरशाह जफर का विद्रोहियों पर न तो नियंत्रण था न ही ज्यादा संपर्क । बहादुरशाह का दुर्बल व्यक्तित्व, वृद्धावस्था तथा नेतृत्व अक्षमता विद्रोहियों को योग्य नेतृत्व देने में सक्षम नहीं थी।
  • कानपुर में अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब सभी की पसंद थे। उन्हें कंपनी ने उपाधि एवं महल दोनों से वंचित कर दिया था तथा उन्हें पूना से निष्कासित कर कानपुर में रहने पर बाध्य कर दिया गया था।
  • विद्रोह के पश्चात नाना साहब ने स्वयं को पेशवा घोषित कर दिया तथा स्वयं को भारत के सम्राट बहादुरशाह के गवर्नर के रूप में मान्यता दी। 27 जून, 1857 को सर ह्यू बोलर ने कानपुर में आत्मसमर्पण कर दिया और उसी दिन उसे मार दिया गया।
  • लखनऊ में विद्रोह का नेतृत्व बेगम हजरत महल ने किया। यहां 4 जून, 1857 को प्रारंभ हुए विद्रोह में सभी की सहानुभूति बेगम के साथ थी। बेगम हजरत महल के पुत्र बिरजिस कादिर को लखनऊ का नवाब घोषित कर दिया गया तथा एक समानांतर सरकार की स्थापना की गयी।
  • इसमें हिंदुओं एवं मुसलमानों की समान भागीदारी थी। यहां के अंग्रेज रेजीडेंट हेनरी लॉरेंस ने अपने कुछ वफादार सैनिकों के साथ ब्रिटिश रेजीडेंसी में शरण ली। लेकिन विद्रोहियों ने रेजीडेंसी
  • पर आक्रमण किया तथा हेनरी लॉरेंस को मौत के घाट उतार दिया। तत्पश्चात, ब्रिगेडियर इंग्लिश ने विद्रोहियों का बहादुरीपूर्वक प्रतिरोध किया। बाद में सर जेम्स आउटम तथा सर हेनरी हैवलॉक ने लखनऊ को जीतने का यथासंभव प्रयास किया, पर वे भी सफल नहीं हो सके।
  • अंततः नये ब्रिटिश प्रधान सेनापति सर कोलिन कैम्पबेल ने गोरखा रेजीमेंट की सहायता से मार्च 1858 में यूरोपियों को छुड़ाने में सफलता पाई। मार्च 1858 तक लखनऊ पूरी तरह अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया, फिर भी कुछ स्थानों पर छिटपुट विद्रोह की घटनायें होती रहीं।
  • रोहेलखंड के पूर्व शासक के उत्तराधिकारी खान बहादुर ने स्वयं को बरेली का सम्राट घोषित कर दिया। कंपनी द्वारा निर्धारित की गई पेंशन से असंतुष्ट होकर अपने 40 हजार सैनिकों की सहायता से खान बहादुर ने लंबे समय तक विद्रोह का झंडा बुलंद रखा।
  • बिहार में एक छोटी रियासत जगदीशपुर के जमींदार कुंवर सिंह ने यहां विद्रोह का नेतृत्व किया। इस 70 वर्षीय बहादुर जमींदार ने दानापुर से आरा पहुंचने पर सैनिकों को सुदृढ़ नेतृत्व प्रदान किया, तथा ब्रिटिश शासन को कड़ी चुनौती दी।
  • फैजाबाद के मौलवी अहमदल्ला 1857 के विद्रोह के एक अन्य प्रमुख नेतृत्वकर्ता थे। वे मूलतः मद्रास के निवासी थे। बाद में वे फैजाबाद आ गये थे. तथा 1857 विद्रोह के दौरान जब अवध में विद्रोह हुआ तब मौलवी अहमदल्ला ने विद्रोहियों को एक सक्षम नेतृत्व प्रदान किया।
  • किंतु 1857 के विद्रोह में इन सभी नेतृत्वकर्ताओं में सबसे प्रमुख नाम झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का था, जिन्होंने झांसी में सैनिकों को ऐतिहासिक नेतृत्व प्रदान किया। झांसी के शासक राजा गंगाधर राव की मृत्यु के पश्चात लॉर्ड डलहौजी ने राजा के दत्तक पुत्र को झांसी का राजा मानने से इनकार कर दिया तथा ‘व्यपगत के सिद्धांत’ के आधार पर झांसी को कंपनी के साम्राज्य में मिला लिया। तदुपरांत गंगाधर राव की विधवा महारानी लक्ष्मीबाई ने ‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी’ का नारा बुलंद करते हुए विद्रोह का मोर्चा संभाल लिया। कानपुर के पतनोपरांत नाना साहब के दक्ष सहायक तात्या टोपे के झांसी पहुंचने पर लक्ष्मीबाई ने तात्या टोपे के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह प्रारंभ कर दिया।
  • तात्या टोपे एवं लक्ष्मीबाई की सम्मिलित सेनाओं ने ग्वालियर की ओर प्रस्थान किया, जहां कुछ अन्य भारतीय सैनिक उनकी सेना से आकर मिल गये। ग्वालियर के शासक सिंधिया ने अंग्रेजों का समर्थन करने का निश्चय किया, तथा आगरा में शरण ली।
  • कानपुर में नाना साहब ने स्वयं को पेशवा घोषित कर दिया. तथा दक्षिण में अभियान करने की योजना बनाई। जून 1858 तक ग्वालियर पुनः अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया।

एक ऐसी महिला जो विद्रोहियों के बीच एकमात्र पुरुष थी। -ह्यूग रोज

(झांसी की रानी को परास्त करने वाले की ओर से उन्हें श्रद्धाजलि )
आम लोगों द्वारा किया गया बलिदान अकथनीय एवं अकल्पनीय था। इस संदर्भ में बागपत (उत्तर प्रदेश) के बड़ौत परगना में एक ग्रामीण, शाह मल, का नाम बेहद उल्लेखनीय है। उसने ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध विद्रोह के लिए लोगों को प्रेरित करने हेतु रात में गांव-गांव जाकर 84 गांवों के मुखियाओं एवं किसानों को संगठित किया। उसके लोगों ने सरकारी भवनों पर कब्जा कर लिया, नदियों पर बने पुलों को ध्वस्त कर दिया, और सड़कों को तोड़ दिया। आंशिक रूप से सरकारी कार्यबलों को क्षेत्र में आने से रोक दिया। शाह मल ने दिल्ली में विद्रोहियों को सामान की आपूर्ति की और ब्रिटिश मुख्यालय तथा मेरठ के बीच सभी आधिकारिक संचार को ठप्प कर दिया। उसने यमुना नदी पर सिंचाई विभाग के बंगले में अपना मुख्यालय बनाया, और वहां से अपने अभियान / कार्य का पर्यवेक्षण तथा नियंत्रण किया। वस्तुतः बंगले को ‘विवादों को सुलझाने तथा न्याय प्रदान करने के लिए ‘न्याय घर’ के रूप में तब्दील कर दिया गया। उसने थोड़े समय के लिए आश्चर्यजनक रूप से आसूचना के एक प्रभावी तंत्र का भी गठन किया; और उस क्षेत्र के लोगों ने महसूस किया कि ब्रिटिश शासन समाप्त हो गया है. और स्वशासन स्थापित हो गया है। दुर्भाग्यवश, जुलाई 1857 में, शाह मल को एक अंग्रेजी अधिकारी ‘डनलप’ द्वारा मार डाला गया। कहा जाता है। कि शाह मल के शरीर के कई टुकड़े किए गए और लोगों को भयभीत करने के लिए 21 जुलाई, 1857 को उसके सिर को सार्वजनिक रूप से लटका दिया गया। 1857 का विद्रोह लगभग एक वर्ष से अधिक समय तक विभिन्न स्थानों पर चला, तथा जुलाई 1858 तक पूर्णतया शांत हो गया।
 विद्रोह का दमन
क्रांति के राष्ट्रव्यापी स्वरूप और भारतीयों में अंग्रेजी सरकार के प्रति बढ़ते आक्रोश को देखकर अंग्रेजी सरकार घबरा गई। क्रांति की विभीषिका को देखते हुए अंग्रेजी सरकार ने निर्ममतापूर्ण दमन की नीति अपनाई। तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने बाहर से अंग्रेजी सेनाएं मंगवाई। जनरल नील के नेतृत्व वाली सेना ने बनारस और इलाहाबाद में क्रांति को जिस प्रकार से कुचला, वह पूर्णतः अमानवीय था। क्रांतिकारियों को छोड़ जनसाधारण का कत्ल किया गया, गांवों को लूटा गया और निर्दोषों को भी फांसी की सजा दी गई।
कमांडर इन चीफ जनरल एनसन ने रेजिमेंटों को आदेश देकर फिरोजपुर, फिल्लौर, अंबाला आदि में निर्ममता से लोगों की हत्या करवाई। सैनिक नियमों का उल्लंघन करने वाले कैदी सिपाहियों में से अनेकों को तोप के मुंह पर बांधकर उड़ा दिया गया। पंजाब में सिपाहियों को घेरकर जिंदा जला दिया गया।
अंग्रेजों ने केवल अपनी सैन्य शक्ति के सहारे ही क्रांति का दमन नहीं किया, बल्कि उन्होंने प्रलोभन देकर बहादुरशाह को गिरफ्तार कर लिया, उसके पु की हत्या करवा दी, सिखों और मद्रासी सैनिकों को अपने पक्ष में कर लिया। वस्तुत:, क्रांति के दमन में सिख रेजिमेंट ने यदि अंग्रेजी सरकार की सहायता नहीं की होती, तो अंग्रेजी सरकार के लिए क्रांतिकारियों को रोक पाना टेही खीर ही साबित होता । क्रांति के दमन में अंग्रेजों को इसलिए भी सहायता मिली कि विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग समय में क्रांति ने जोर पकड़ा था।
विद्रोह को अंततः कुचल दिया गया। ब्रिटिश शासन ने एक लंबी एवं भयानक लड़ाई के पश्चात् 20 सितंबर, 1857 को दिल्ली पर कब्जा कर लिया। जॉन निकोलसन, इस घेराबंदी का नेतृत्व करने वाला बुरी तरह घायल हो गया और बाद में उसने दम तोड़ दिया।
1859 के अंत तक भारत पर ब्रिटिश सत्ता पुनः काबिज हो गई। यद्यपि ब्रिटिश
सरकार ने देश में अत्यधिक लोगों, धन एवं हथियारों की आपूर्ति की. तथापि
भारतीयों के दमन के माध्यम से बाद में इस पूरी लागत को वसूल लिया गया।
विद्रोह असफल क्यों हुआ ?
क्रांतिकारियों ने जिस उद्देश्य से 1857 की क्रांति का सूत्रपात किया था, उसमें उन्हें सफलता नहीं मिली। उन्होंने सोचा था कि अंग्रेजों को बाहर खदेड़कर भारत को स्वाधीन करा लेंगे। परंतु, क्रांति के दमन के बाद अंग्रेजों ने ऐसी नीति अपनाई कि वे और 90 वर्षों तक भारतीयों को गुलाम बनाए रखने में सफल रहे। इस महान क्रांति की असफलता के अनेक कारण थे, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं-
विद्रोह में सभी वर्गों का शामिल न होना.
कुछ वर्गों ने विद्रोह में सहभागिता नहीं की, वस्तुतः, इसके विरुद्ध कार्य किया। बड़े जमींदारों एवं तालुकदारों ने इसमें भाग नहीं लिया। महाजनों एवं व्यापारियों ने विद्रोहियों का पूरी तरह शोषण किया क्योंकि ब्रिटिश संरक्षण में वे अधिक सुरक्षित महसूस करते थे। आधुनिक शिक्षित भारतीयों ने इस विद्रोह को पीछे लौटने के तौर पर देखा और उनका मानना था कि ब्रिटिश शासन भारत को आधुनिकता की ओर ले जाएगा। अधिकतर भारतीय शासकों ने विद्रोह में शामिल होने से मना
कर दिया और प्रायः ब्रिटिश शासन की सक्रिय मदद की। पटियाला के शासक सिंध एवं अन्य सिख सरदार, कश्मीर के महाराजा, ग्वालियर के सिंधिया और इंदौर के होल्कर विद्रोह में शामिल नहीं हुए। अधिकतर दक्षिण भारत इससे अधिक प्रभावित नहीं हुआ। एक आकलन के अनुसार, कुल क्षेत्र का एक-चौथाई और कुल जनसंख्या का एक दसवां से अधिक भाग इस विद्रोह से प्रभावित नहीं हुआ।
एक संगठित एवं एकबद्ध विचारधारा का अभाव
विद्रोहियों को औपनिवेशिक शासन की स्पष्ट समझ नहीं थी, और न ही उनके पास भविष्योन्मुखी कार्यक्रम. एक सुसंगत विचारधारा, एक राजनीतिक परिदृश्य या एक सामाजिक विकल्प ही था। विद्रोही अलग-अलग समस्याओं एवं तत्कालीन राजनीति की अवधारणाओं सहित विविध पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते थे।
भारतीयों के बीच एकता के अभाव को भारतीय इतिहास के इस चरण में शायद उपेक्षित नहीं किया जा सकता था। भारत में अभी भी आधुनिक राष्ट्रवाद के बारे में लोग अनभिज्ञ थे। वस्तुतः 1857 के विद्रोह ने भारतीय लोगों को साथ लाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और एक देश से संबद्ध होने की चेतना जागृत की।
निश्चित समय की प्रतीक्षा न करना 1857 की क्रांति की देशव्यापी शुरुआत के लिए 31 मई, 1857 का दिन निर्धारित किया गया था। परंतु, सैनिकों ने आक्रोश में आकर निश्चित समय से पूर्व 10 मई 1857 को ही विद्रोह कर दिया। सैनिकों की इस कार्यवाही के कारण क्रांति की योजना अधूरी रह गई। निश्चित समय का पालन न होने के कारण देश के विभिन्न क्षेत्रों में क्रांति की शुरुआत अलग-अलग दिनों में हुई। इससे अंग्रेजों को क्रांतिकारियों का दमन करने में काफी सहायता मिली। अनेक स्थानों पर तो 31 मई की प्रतीक्षा कर रहे सैनिकों के हथियार छीन लिए गए। यदि सभी क्षेत्रों में क्रांति का सूत्रपात एक साथ हुआ होता, तो तस्वीर कुछ और ही होती।
देशी राजाओं का देशद्रोही रुख
1857 की क्रांति का दमन करने में अनेक देशी राजाओं ने अंग्रेजों की खुलकर सहायता की पटियाला, नाभा, जींद, अफगानिस्तान और नेपाल के राजाओं ने अंग्रेजों को सैनिक सहायता के साथ-साथ आर्थिक सहायता भी दी। देशी राजाओं की इस देशद्रोहितापूर्ण भूमिका ने क्रांतिकारियों का मनोबल तोड़ा और कांति के दमन के लिए अंग्रेजी सरकार को प्रोत्साहित किया।
सांप्रदायिकता का खेल
1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजी सरकार हिंदुओं और मुसलमानों को लड़ाने में तो सफलता प्राप्त नहीं कर सकी. परंतु आशिक रूप से ही सही सांप्रदायिकता का खेल खेलने में सफल रही। सांप्रदायिक भावनाओं को उत्तेजित कर ही अंग्रेजी सरकार ने सिख रेजिमेंट और मद्रास के सैनिकों को अपने पक्ष में कर लिया। मराठों, सिखों और गोरखाओं को बहादुरशाह के खिलाफ खड़ा कर दिया गया। उन्हें यह महसूस कराया गया, कि बहादुरशाह के हाथों में फिर से सत्ता आ जाने पर हिंदुओं और सिखों पर अत्याचार होगा। इसका मूल कारण था कि संपूर्ण पंजाब में अंग्रेजों की ओर से बादशाह के नाम झूठा फरमान जारी किया गया जिसमें कहा गया था कि लड़ाई में जीत मिलते ही प्रत्येक सिख का व कर दिया जाएगा। सैनिकों के साथ-साथ जनसाधारण को भी गुमराह किया गया। इस स्थिति में क्रांति का असफल हो जाना निश्चित हो गया। जब देश के भीतर देशवासी ही पूर्ण सहयोग न दें, तो कोई भी क्रांति सफलता प्राप्त नहीं कर सकती।
संपूर्ण देश में प्रसारित न होना
  1. 1857 की क्रांति का प्रसार संपूर्ण भारत में नहीं हो सका था।
  2. संपूर्ण दक्षिण भारत और पंजाब का अधिकांश हिस्सा, भारत के पूर्वी एवं पश्चिमी भाग इस क्रांति से अछूते रहे
  3. यदि इन क्षेत्रों में क्रांति का विस्तार हुआ होता, तो अंग्रेजों को अपनी शक्ति इधर भी लगानी पड़ती और वे पंजाब रेजिमेंट तथा मद्रास के सैनिकों को अपने पक्ष में करने में असफल रहते।
  4. ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि इन क्षेत्रों में पूर्व में हुए विद्रोहों को कंपनी ने बर्बरतापूर्वक कुचल दिया था।
  5. शस्त्रास्त्रों का अभाव क्रांति का सूत्रपात तो कर दिया गया, किंतु आर्थिक दृष्टि से कमजोर होने के कारण क्रांतिकारी आधुनिक शस्त्रास्त्रों का प्रबंध करने में असफल रहे।
  6. अंग्रेजी सेना ने तोपों और लंबी दूरी तक मार करने वाली बंदूकों का प्रयोग किया, जबकि क्रांतिकारियों को तलवारों और भालों का सहारा लेना पड़ा।
  7. इसलिए, क्रांति को कुचलने में अंग्रेजों को सफलता प्राप्त हुई।
सहायक साधनों का अभाव
  • सत्ताधारी होने के कारण रेल, डाक, तार एवं परिवहन तथा संचार के अन्य सभी साधन अंग्रेजों के अधीन थे। इसलिए, इन साधनों का उन्होंने पूरा उपयोग किया। दूसरी ओर, भारतीय क्रांतिकारियों के पास इन साधनों का पूर्ण अभाव था। क्रांतिकारी अपना संदेश एक स्थान से दूसरे स्थान तक शीघ्र भेजने में असफल

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